डिअर X ,
अक्टूबर की धूप खिड़की से छनकर मेरे चेहरे पर ग्रिल के निशान बना रही है। अक्टूबर की धूप वही है, पर उसके संग कितनी सारी यादें मिश्री की तरह घुल जाती हैं। भारत में बिताया बचपन याद आता है—जहाँ सर्दी, गर्मी, बरसात—हर मौसम का अलग रंग होता था। यहाँ की धूप हमेशा एक जैसी है, लेकिन वहाँ की धूप कभी ज्यादा पीली हो जाती थी, कभी सफेद-सी। कभी गुनगुनी तो कभी तीखी। अक्टूबर में लगता था जैसे धूप शरद ऋतु की चादर ओढ़े पंखों पर बैठकर अक्टूबर हमारे गाँव आ उतरती हो।
अक्टूबर त्योहारों का महीना होता था। नौ दिन की रामलीलाओं में डूबा हुआ गाँव, मानों राम लक्ष्मण स्वयं पधार चुके हैं। दशहरे और भरतमिलाप के मेले—मानो गाँव के उस छोटे से मेले में पूरी दुनिया खरीदी जा सकती थी। फिर आती थी दिवाली, जब लगता था जैसे पूरा संसार ही धुलकर जगमग हो गया हो। भारत में जन्मे हर इंसान के यहाँ त्योहार भले अलग-अलग हों, पर कश्मीर से कन्याकुमारी, कटक से अटक तक, अक्टूबर महीने में शिराओं में बहता खून गर्मजोशी से भरा होता है।

