इंडियापा विनोद दूबे का उपन्यास है, जिसकी कहानी प्रेम, स्मृतियों, रिश्तों और जीवन के उन फैसलों के आसपास बुनी गई है, जो समय बीत जाने के बाद भी मन के भीतर बने रहते हैं। कहानी के केंद्र में सागर शुक्ल हैं, जो वर्षों विदेश में रहने के बाद अपने शहर बनारस लौटते हैं। फिनलैंड की व्यस्त और व्यवस्थित जिंदगी से लौटकर जब सागर बनारस की गलियों, घाटों और अपनी पुरानी छत को देखते हैं, तो उनके सामने बीते हुए वर्षों की यादें फिर से जीवित होने लगती हैं।

सागर के जीवन में भक्ति का प्रेम एक ऐसा अध्याय है, जिसे वे पीछे छोड़ना तो चाहते हैं, लेकिन पूरी तरह भूल नहीं पाते। सारिका से होने वाली मुलाकात उन्हें अपने अतीत का सामना करने और उन सवालों के जवाब खोजने के लिए प्रेरित करती है, जिनसे वे वर्षों से बचते रहे हैं। कहानी में बनारस केवल एक शहर नहीं, बल्कि सागर की स्मृतियों और भावनाओं का अभिन्न हिस्सा बनकर सामने आता है। गंगा के घाट, संकरी गलियां, नाव की सवारी और पुराने रिश्तों की यादें कहानी को एक आत्मीय वातावरण देती हैं।

इंडियापा प्रेम की शुरुआत से लेकर बिछड़ने के दर्द और आगे बढ़ने की कोशिश तक, एक ऐसे सफर की कहानी है जिसमें पाठक अपने जीवन की कुछ अनकही स्मृतियों को भी महसूस कर सकता है।

पुस्तक अंश

सालों बाद बनारस लौटा था मैं। सच कहूं तो यहां के हर एक कोने में भक्ति की यादों की खुशबू बिखरी थी। उसके साथ गुजरे लम्हे हर तरफ फैले हुए थे। इन्हीं से तो आज तक भागता रहा। पर अब जब मैं जान गया था कि भक्ति अपनी जिंदगी में खुश है, तो शायद मैं इन सबका सामना करने को तैयार था। सालों बाद आज मैं बनारस से मिलने को तैयार था।

आज बनारस को मैं खुलकर महसूस करना चाहता था। शायद इसीलिए बाइक या कार निकालने का मन नहीं किया। मैं घर से पैदल ही निकल पड़ा। थोड़ी दूर पैदल चलने के बाद रोड पर पहुंचा। इतनी सुबह एक ऑटो रिक्शा सड़क पर यात्रियों के इंतजार में खड़ा नजर आया। मैंने सोचा, मेरा देश बदला नहीं। लोग आज भी इतनी सुबह अपने अपने कामों के लिए निकल चुके थे। हर इंसान की अपनी वजह थी। किसी को सुबह वाली ट्रेन पकड़ने की जल्दी थी, किसी को गंगा की पवित्रता में सबसे पहले गोता लगाने की जल्दी और किसी को नन्हे बच्चों को स्कूल से पहले कोचिंग क्लास में पहुंचाने की जल्दी।

ऑटो में मेरे बगल में बैठे बच्चे को देखकर लगा, पता नहीं आधी नींद में डूबी उसकी आंखें मां बाप के सपनों का बोझ ढो पाएंगी भी या नहीं। सबको तो टॉप करना होता है हमारे यहां। काश एक क्लास में सारे टॉपर्स होते। कम से कम उस बच्चे की नींद तो पूरी हो जाया करती।

इसी भीड़ का हिस्सा मैं भी था। और मेरी भी इस जमात में शामिल होने की वजह थी। कुछ बातें मेरे मन को कब से सालती जा रही थीं। सोते वक्त सीने में अजीब सा दर्द रहता था। आंख लगती, भक्ति का दुखी चेहरा दिख जाता और फिर सोना दुश्वार हो जाता। ऑटो रिक्शा में बैठा मैं आज बनारस की ये सुबह सिर्फ उसकी यादों के साथ गुजारना चाहता था।

बड़े दिनों बाद मैं इतनी सुबह बनारस को इतने करीब से देख रहा था। शायद एक बार गंगा आरती देखने इतनी सुबह हम दोनों अस्सी घाट पर गए थे। उस दिन भक्ति ने कहा था, “किसी ने ऐसे ही नहीं सुबह-ए-बनारस के बारे में इतना कुछ कहा होगा। कहते हैं कि लोग मरते वक्त बनारस में रहना चाहते हैं। पता नहीं क्यों। यहां जीने में भी कम मजा नहीं है।”

तब मैं सिर्फ मुस्कराया था। आज लगता है वो सही थी।

मैंने संदेश देखकर पुष्टि की कि आज मेरी सारिका से मुलाकात गंगा के बालाजी घाट पर होनी थी।

अस्सी घाट, हरिश्चंद्र घाट, मणिकर्णिका घाट। ये ऐसे नाम हैं जो प्रसिद्ध घाटों की सूची में सबसे ऊपर हैं। पर यह सूची तो सिर्फ बाकी लोगों के लिए है। बालाजी घाट मेरे लिए पुरानी यादों का सैलाब लिए गंगा की निगरानी करता है। उन दिनों मेरे हर अवकाश का नियम था कि मैं और भक्ति कम से कम एक बार मंगला गौरी के मंदिर जाते और वहीं से बालाजी घाट पर निकल लेते। वहां बैठकर हम घंटों बातें करते।

मंगला गौरी मंदिर में ऐसा क्या खास था, यह न उसने मुझे कभी बताया और न मैंने जानने की कोशिश की। सालों बाद जब शादी के बाद मेरी मां मेरी पत्नी के साथ मुझे वहां ले गईं, तब पता चला कि यहां जोड़े अपने सुखद वैवाहिक जीवन की कामना के लिए आते हैं। मैं सोचने लगा कि पता नहीं क्यों इस मंदिर की मूर्ति ने भक्ति की अर्जी नहीं सुनी। लेकर तो मुझे वो भी कई बार गई थी।

आज भी मैं अपने उसी पुराने रास्ते पर चलना चाहता था। मंगला गौरी के मंदिर से होते हुए बालाजी घाट तक जाने का रास्ता हमेशा भक्ति के माथे छोड़ रखा था। आज इस बात की कमी खली। लगा, मुझे भी रास्ता समझ लेना था। किसी के माथे कुछ छोड़ देने की आदत पड़ जाए तो उस इंसान के न होने का दर्द थोड़ा ज्यादा ही होता है।

मैं चलता रहा। गंगा घाट तक पहुंचने का रास्ता मुझे ठीक से याद नहीं था, पर भक्ति की यादों के सहारे मैं बालाजी घाट के पास पहुंच चुका था।

मंदिर के पास पहुंचकर कुछ पल के लिए ठिठक गया। आंखों के सामने एक पुरानी तस्वीर फिर से चमक उठी। लाल रंग की कमीज, सफेद सलवार और बहुरंगी चुन्नी सिर पर डाले भक्ति मेरे बगल में आंखें बंद किए खड़ी थी। वह कितनी आस्था से उस दिन खड़ी थी। मैंने उसकी तरफ देखा और फिर शर्मिंदा होकर अपनी नजरें झुका ली थीं।

मंदिर से आगे जाती सीढ़ियां मुझे घाट तक ले आईं। बरसों बाद इन सीढ़ियों से गुजर रहा था मैं। घुमावदार सीढ़ियों से बाहर आते ही साक्षात गंगा सामने दिखाई दी।

ऐसा लगा जैसे किसी अंधेरी गुफा से घंटों गुजरने के बाद अचानक रोशनी से आंखें चौंधिया गई हों।

गंगा और उसके बनारसी घाट। चाहे कितनी बार भी देखूं, हर बार इनकी खूबसूरती मुझे हैरान कर देती है। लगता है जैसे पहली बार आया हूं। “अद्भुत” शब्द में भी इसकी खूबसूरती कैद करने की क्षमता नहीं होगी।

मैं पहले भी कई बार यहां आ चुका था, पर इतनी सुबह का नजारा, इतनी खामोशी में, इतने करीब से प्रकृति को निहारने का आनंद ही कुछ और था। जैसे लहरों की सांसें भी आप सुन सकते हों। सूरज के आने से पहले की हल्की सी लाली नीले आसमान को सुंदर रंग में लपेटे थी। गंगा के पानी में जैसे एक नीली सी खामोशी घुली हुई थी। पानी के ऊपर कुहरे की एक परत चादर की तरह लिपटी नजर आ रही थी। छोटी छोटी लहरें हल्के कदमों से चलती नजर आ रही थीं, जैसे नींद से अभी अभी उठी हों और आंखें मल रही हों।

मैं चुपचाप घाट की एक सीढ़ी पर बैठ गया। वहीं, जहां कभी मेरे बगल में वो बैठा करती थी।

धीरे धीरे मेरी नजरें घूमकर सारा मंजर अपनी आंखों में कैद करने लगीं। कुछ नाविक अपनी नावों की सफाई और सजावट करते नजर आए। कुछ लोग डुबकी लगाकर अपने पाप धोते हुए दिखाई दिए। कुछ औरतें अपनी गोद में बच्चे लिए ऐसे जल चढ़ा रही थीं, जैसे अपनी बची खुची उम्र का सारा आशीर्वाद उस बच्चे के माथे पर उड़ेल देना चाहती हों।

मेरी आंखें इस पूरे दृश्य को ऐसे देख रही थीं जैसे किसी फिल्म के कैमरे का फ्रेम धीमी गति में घूम रहा हो। एक बार मन किया कि अपने फोन से तस्वीर ले लूं। फिर लगा कि अपनी आंखों के कैमरे से मन की हार्ड डिस्क में तस्वीर ही तो स्टोर कर रहा हूं। जेब से फोन निकालने में क्यों वक्त जाया करूं।

जी करता था कि इस खूबसूरती में ऐसे रम जाऊं कि मेरा कोई अस्तित्व ही न बचे। जैसे मैंने खुद को इस शांत वातावरण में घोल दिया हो।

खामोशी तो मुझे फिनलैंड से ही मिलने की कोशिश कर रही थी, पर सालों बाद सुबह सुबह घाट पर बिखरी इस फिजा में मेरा मन खामोश हो पाया था। जैसे किसी आध्यात्मिक सत्य की अनुभूति में, मैं यह भी भूल गया कि मैं इतनी दूर इस घाट पर सारिका से मिलने आया हूं।

धीरे धीरे चलती मेरी नजरें गंगा के उस पार की तरफ गईं। सामान्य आंखों से देखें तो सिर्फ बंजर रेत नजर आती है। पर मेरी आंखों के लिए वहां कुछ और ही था। उस रेत को देखते ही यादों का सैलाब जैसे मेरी आंखों में उमड़ आया।

वहीं तो मेरे और भक्ति के सपनों का शहर था।

न जाने कितनी बार हम उस पार गए होंगे। हमारी दोस्ती, हमारी मस्ती, हमारे करीब आने का गुलाबी एहसास, हमारे डिस्कशन, हमारी मीठी नोकझोंक और आखिर में वह मुलाकात। कितना कुछ था वहां।

जैसे लगता है कि हमारा रिश्ता गंगा उस पार, उस बंजर रेत में जन्मा, जवान हुआ और वहीं दफन भी हो गया।

मैंने गंगा में चलती कुछ नावों की तरफ देखा। मुझे याद आया कि हमारा एक पसंदीदा मल्लाह हुआ करता था, शिवकुमार। हम उसे प्यार से पगई कहते थे। वह दुबला पतला सा लड़का था। एक गरीब भारत की कहानी था वो। कम उम्र में शादी, कम उम्र में पिता की मृत्यु, परिवार की जिम्मेदारियां और फिर भी चेहरे पर ऐसी खुशी, जिसे देखकर मैं अक्सर हैरान रह जाता था।

उसकी जिंदगी की वाट लगी पड़ी थी। कम उम्र में इतना कुछ झेल चुका था। मां, पत्नी, बच्चा, बहन और छोटे भाई की जिम्मेदारियां उसके कंधों पर थीं। फिर भी चेहरे पर इतनी खुशी।

कितनी बार तो उसका खिलखिलाकर हंसना मुझे हैरान कर जाता था। सोचता था कि साधारण से आदमी के अंदर भी एक असाधारण सा हीरो हो सकता है। जो दिखाई भले ही न दे, पर उसकी कहानी जानने पर उसे महसूस जरूर कर सकते हैं।

जैसे ही मैं और भक्ति घाट पर नजर आते, शिवकुमार के दोस्त और बाकी मल्लाह चिल्ला पड़ते, “हे पगई, तोहार कस्टमर आइल बा।”

हम दोनों शिवकुमार के स्थायी ग्राहक थे। वह हमें घाट के इस पार के बनारस की दुनिया से दूर, उस पार रेत पर बसी हमारी अपनी दुनिया में ले जाता था।

लोग सच ही कहते हैं कि रेत से बनी चीजें जल्दी ढह जाती हैं।

हमारी तो कहानी ही रेत पर लिखी थी।

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