
About The Book
विनोद दूबे का उपन्यास ओक्का-बोक्का जीवन के अलग-अलग पड़ावों से गुजरते एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो सफलता की दौड़ में बहुत कुछ हासिल करने के बाद एक दिन अचानक रुककर पीछे देखने को मजबूर होता है। कहानी की शुरुआत जबलपुर की एक शादी की रात से होती है, जहां शरद वर्षों बाद अपने बचपन के दो दोस्तों अनवर और सुलभ से मिलता है। हंसी-मजाक और पुरानी यादों के बीच अचानक शरद की तबीयत बिगड़ जाती है और उसे अस्पताल ले जाना पड़ता है।
अस्पताल का बिस्तर शरद के लिए केवल बीमारी का पड़ाव नहीं बनता। यहीं से वह अपनी पूरी जिंदगी को दोबारा देखने लगता है। बचपन, स्कूल, कॉलेज, प्यार, नौकरी, शादी, बच्चे, पद और सफलता के रास्ते से गुजरती उसकी कहानी धीरे-धीरे जीवन के उन सवालों तक पहुंचती है, जिन्हें भागती हुई जिंदगी में वह पीछे छोड़ आया था। पुस्तक की विषय-सूची भी इसी जीवन यात्रा को दस पड़ावों में सामने रखती है।
दोस्ती, परिवार, बदलता शहर, बचपन की स्मृतियां और जीवन की दौड़ इस कहानी के प्रमुख आधार हैं। ओक्का-बोक्का पाठक को यह सोचने का अवसर देती है कि जिंदगी में आगे बढ़ते हुए कहीं हम उन चीजों को तो पीछे नहीं छोड़ देते, जिनके बिना सफलता भी अधूरी लगती है।
विनोद दूबे ने इन कविताओं में अपने आसपास की साधारण लगने वाली चीजों को विषय बनाया है। कहीं मां के आने से लौटता बचपन है, कहीं गांव की छूटती हुई पहचान है। कहीं नौकरी, प्रतिष्ठा और आगे निकलने की दौड़ के बीच पीछे छूट गए सपनों की याद है तो कहीं कॉर्पोरेट जीवन की चमक के पीछे छिपी संवेदनाएं हैं।
इन कविताओं की खासियत यह है कि वे बड़े प्रश्नों को रोजमर्रा के अनुभवों के माध्यम से सामने लाती हैं। भाषा सहज है और अनुभव निजी होते हुए भी पाठक को अपने जीवन से जुड़े लग सकते हैं। कस्तूरी भीतर छिपे उस सुकून की तलाश है, जिसे मनुष्य अक्सर बाहर खोजता रहता है।
पुस्तक अंश
“शांति मन के भीतर होती है और हम उसे बाहर ढूंढते रहते हैं।”
ओशो ने यह बात भी इसी जबलपुर में ही कभी सोची होगी। और आज जबलपुर की इस पुरानी हो चली छत पर खड़ा, मैं भी यही सोच रहा हूँ।
ऑफिस के चमचमाते चैम्बर में लैपटॉप को घूरते, चारों तरफ बिखरी खामोशी में भी मन कितना अशांत रहता था। और जिस शांति को मैं सालों से ढूंढ रहा था, वह मिली भी तो कहाँ? आज, चांदनी रात में अकेले खड़े इस छत पर। जबकि मेरे सामने शादी का कान फाड़ू शोरगुल चल रहा है।
मैंने नजरें नीचे घुमाईं तो एक वृत्त नजर आया। उम्र के पड़ावों को परिधि पर छूता। हम सबकी जिंदगी का सर्किल।
गोद की उम्र के बच्चों को, मां-बाप की पसंद से पहने खूबसूरत कपड़ों के बोझ तले दबे और दूध की बोतल मुंह में घुसेड़े, बिलखते देख रहा हूँ। माता-पिता उनके कपड़े पर गिरा खाना और दूध आहिस्ता से झाड़कर उन्हें सलीके का बनाने की कोशिश कर रहे थे। शायद बच्चे भी मन ही मन सोच रहे होंगे कि जल्द ही स्कूल जाने की उम्र के हो जाएं तो वे मां-बाप के चंगुल से दूर, अपनी मर्जी से खा-पी और पहन-ओढ़ सकेंगे।
स्कूल की उम्र के बच्चों को भी मां-बाप से छुपकर मुंह में आइसक्रीम की लीपा-पोती करते देख रहा था। अगर सोचें कि उन बच्चों के मजे हैं तो यह भी गलत होगा। मन उनका भी शांत नहीं था। उनकी नजरें भी कॉलेज की उम्र के उन भैया और दीदियों पर टिकी थीं, जो डीजे की लगाई धुनों पर धरती फाड़ अंदाज में थरथराते हुए मचल रहे थे।
‘सैयांजी से आज मैंने… ब्रेकअप कर लिया’ गाने पर उनका अंदाज-ए-डांस देखकर एकबारगी तो लगेगा जैसे प्रलय का समय नजदीक है और ये आनंदप्रद अवस्था में शिव तांडव कर रहे हैं। गौर से देखने पर समझ आया कि यह सारी मेहनत सिर्फ विपरीत लिंग के साथ नैन-मटक्का करने का जरिया मात्र थी। इन्हें भी किसी के साथ जीवन भर के लिए बंध जाने की जल्दी है।
वहीं स्टेज के पास शादी-शुदा मर्दों को राजनीति या क्रिकेट पर चर्चा करते और महिलाओं को एक हाथ से साड़ी तो दूसरे से फोन संभालते देख रहा था।
जैसे फोन और साड़ी नहीं, बल्कि गुजरती जवानी और आने वाला बुढ़ापा एक साथ संभाल रही हों।
डीजे की आवाज और स्टेज की चमचमाहट से दूर एक कोने में, कुछ बुजुर्गों को भी देख रहा था। बीच-बीच में उनके बच्चे उन्हें कुछ खाने को भी दे रहे थे और उनके कपड़ों पर गिरा खाना भी आहिस्ता से झाड़कर, थोड़ा मुंह बनाते हुए उन्हें सलीके का बनाने की कोशिश कर रहे थे।
मुझे गणित वाले मास्साब का पढ़ाया वृत्त याद आया। परिमाप, क्षेत्रफल, सब बता दिया था उन्होंने। बस यह नहीं बताया था कि जिन्दगी भी बिल्कुल ऐसी ही है।
नीचे के तमाम शोर-शराबे के बावजूद, छत पर खड़ा मैं, बिल्कुल शांत मन से सबकुछ देख रहा था। छत पर अनवर और सुलभ के आने का मुझे इंतजार था। नजरें दूर नेपियर टाउन की चमचमाती बिजली के खम्भों के बीच शकुंतला के बाड़े पर पड़ीं।
‘आज फिर से वहीं खड़ा हूँ, जहाँ से शुरू किया था। बस ठीक से सर्कल ड्रा करना न तब आया था और न आज। शायद इसीलिए सिरे ठीक से नहीं मिल रहे। वैसे भी, कहने को जिंदगी गोल है, लेकिन इसमें इतने ट्विस्ट और टर्न आते हैं कि इस सीधे-साधे सर्कल को स्पाइरल बनाकर छोड़ते हैं।’
मैं मन ही मन मुस्करा पड़ा था।
मैं भीड़ का हिस्सा होते हुए भी, भीड़ से अलग हो गया था। पुरानी यादों का सैलाब भीतर उमड़-घुमड़ रहा था। फिर भी मन आज इतना शांत था, जैसे बारिश के बाद सड़क के किसी गड्ढे में इकट्ठे पानी के भीतर चांद का प्रतिबिम्ब।
“शरद! अमां किधर छुपे बैठे हो, यार?”
पहली आवाज अनवर की थी।
“साले, जिंदा है कि मर गया?”
दूसरी आवाज सुलभ की।
गड्ढे के पानी में दोनों ने छपाक-छपाक की आवाज करते पैर रख दिए थे और चांद हिल गया था। इत्तेफाकन, हम तीनों ठीक तीन साल बाद मिल रहे थे।
“हाँ भाई, यहां से व्यू बढ़िया है। औरतों को यहां से छुप-छुप के ताड़ने में कोई रिस्क भी नहीं है।”
सुलभ ने मैदान में आते ही धोनी की तरह अपना हेलीकाप्टर शॉट खेल दिया था।
अनवर चुप-चाप गले लगा। गले में कई दोस्तों के लगा होऊंगा पर अनवर का गले लगना हमेशा अलग अहसास देता था।
“थैंक्स फॉर कमिंग… यार, मैं तुझे नीचे खोज रहा था, पर सुलभ ने थोड़ी देर पहले बताया कि तू छत पर है।” अनवर ने फूलती सांसों को थामते हुए कहा।
उम्र हम तीनों पर हावी होती दिख रही थी।
“भाई, जुगाड़ कर लाया हूँ।”
सुलभ और अनवर हाथ में बीयर की बोतलें लिए छत पर हांफते हुए आए थे।
“भाई की रगों में मारवाड़ी खून हिचकोले मारता है। मजाल है कोई भी चीज यह न जुगाड़ लायें।”
मैंने शोले के गब्बर वाले अंदाज में अपने कालिया और सांभा को शाबाशी दी।
“साले, मजाक उड़ा रहा है। साइंस लिया होता तो आज चन्द्रयान तेरा यह भाई लैंड करा चुका होता।”
“वैसे, भाई ने साइंस लेने की सोची तो जरूर थी पर बेचारा साइंस इनकी माया नहीं समझा पाया।”
अनवर को सुलभ की टांग खींचने का मौका गंवाना नागवार था।
“साले, तुम लोगों ने कभी जस्टिन बीबर का गाना सुना है। लाख कोशिश करता हूँ, फिर भी सिर्फ इतना ही समझ में आता है ‘हेबेईबे, बेईबे!’ उसके बाद जब प्रभुलुडाक्रिस अंग्रेजी में श्लोक सुनाते हैं, घंटा समझ आता है। साइंस के साथ मेरा रिश्ता बीबर जी के इस गाने की तरह था। कोशिश मैंने बहुत की, पर पहले पन्ने के बाद कुछ समझ ही नहीं आया। एक एटम यहां से वहां चला गया, इस गति से चला गया, इतने टाइम में चला गया। अबे, ये एटम भी कम लतखोर नहीं हैं। शांति से बैठा नहीं जाता क्या इनसे?”
सुलभ की बात पर हम सब हंस पड़े।
“वैसे मुझे पता है, तूने कॉमर्स क्यूं लिया था। अनवर, कौन थी बे वह गोरी-सी लड़की जिसने भाई को घायल कर दिया था?”
मेरी इस बात से ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया। सुलभ पहली बार शरमाया था।
“सुलभा… और मियां को प्यार भी इसलिए हुआ था क्योंकि नाम मैच कर रहा था। धत्त साला! प्यार के बड़े कारण सुने होंगे, लेकिन ऐसा नहीं सुना था हमने।”
अनवर भाई हमेशा कम शब्दों में ज्यादा कुछ बता देने में विश्वास रखते थे।
“सुलभ वेड्स सुलभा… साले, तूने अपनी कॉपी के हर पन्ने पर यही लिखा था, है न?”
मैंने छेड़ा।
“अबे, उसके चक्कर में कॉमर्स ज्वाइन नहीं किया था! हमारे पिता जी चाहते थे कि बिजनेस में हाथ बटाऊं इसलिए मुझे कॉमर्स पढ़ाना चाहते थे।”
सुलभ सफाई देने लगा।
“हाँ, वह बात अलग है कि उसके क्लास में होने की वजह से मेरी अटेंडेंस हंड्रेड पर्सेन्ट हो गयी थी।”
सुलभ ने अपनी चोरी स्वीकार कर ली थी।
“चियर्स!”
शादी के चमचमाते झालरों के बीच, उस खामोश छत पर हम तीनों इतना खुल के हंसे कि हमारी हंसी की गूंज जबलपुरिया आसमान में छिटके तारों तक पहुंच गयी।
हमारी जिंदगियों में कुछ भी चल रहा हो, हम जब मिलते तो सब भूल जाते।
मैं चांदनी रात में छत पर जमी इस महफिल को एन्जॉय कर रहा था।
“…और भाई लोग, लाइफ कैसी चल रही है?”
बातचीत चलती रही। पुरानी दोस्ती, पुरानी शरारतें और बीते हुए साल जैसे उस छत पर फिर से लौट आए थे।
लेकिन कुछ ही देर बाद मेरे सीने में दर्द बढ़ने लगा।
“शरद, थोड़ा लेट जा। थक गया होगा।”
अनवर ने मेरे सिरहाने तकिया रखा।
मैं जैसे ही लेटा, सीने में तेज दर्द उठा। मैं चीख पड़ा।
“दर्द बढ़ रहा है, यार… सांस नहीं लिया जा रहा है।”
मेरी सांसों का फूलना बढ़ने लगा। मैं उन दोनों के चेहरों पर हवाइयां बिखरते हुए देख पा रहा था।
“डॉक्टर को कॉल करता हूं, यार। तू लेट जा।”
सुलभ अबकी बार गंभीर था।
मेरी आंखें बंद होती जा रही थीं और सांसों के लिए संघर्ष तेज।
“सुलभ, रुको! मैं इकबाल से बात करता हूं।”
अनवर ने सुलभ से कहते हुए मेरे सिर पर ढांढस में हाथ फेर दिया था।
थोड़ी देर पहले छत पर महफिल जमाते हम तीनों दोस्त एम्बुलेंस की तरफ बढ़ चले।
तीन साल बाद यह सोचकर लौटा था कि दोस्तों के साथ जबलपुर के चप्पे-चप्पे में कैद पुरानी यादें छू आऊंगा। लेकिन वक्त को शायद यही मंजूर था कि रात के तकरीबन नौ बजे, इन सड़कों पर सरपट दौड़ती एम्बुलेंस में स्ट्रेचर पर लेटा, मैं सांसों से जिंदगी की लड़ाई लड़ूं।
कहने को तो मैंने बीते पचास सालों में बहुत कुछ हासिल किया था। पैसा, ओहदा, सम्मान, रिश्ते… पर इस वक्त मेरे इन दो दोस्तों और मेरे परिवार के अलावा मेरे मन में दूर-दूर तक कोई भी नहीं था।
मुझे नहीं पता था कि मेरा फोन, पर्स, क्रेडिट कार्ड्स, सब कहां पड़े थे। मुझे नहीं पता था कि मैं फिर से ऑफिस के लोगों से लौटकर मिल पाऊंगा या नहीं। मुझे नहीं पता था कि इंश्योरेंस वाले पैसे मेरे घरवालों को मिलेंगे या नहीं।
मुझे सिर्फ और सिर्फ इतना पता था कि मुझे और जीना है।
इतनी जल्दी हार नहीं माननी है।
अस्पताल पहुंचने तक मुझे खुद को रोककर रखना था। जैसे अपनी पहली मैराथन दौड़ के आखिरी चंद किलोमीटर पहले लगा था कि मेरा शरीर नहीं, सिर्फ मेरी इच्छाशक्ति दौड़ रही है, आज भी अस्पताल पहुंचने के कुछ मिनट पहले मुझे ठीक वैसा ही महसूस हुआ।
जिंदगी की जिस दौड़ में मैं इतने वर्षों से भाग रहा था, उस दौड़ के बीच पहली बार मुझे रुककर यह समझ में आ रहा था कि मंजिल तक पहुंचना ही सबकुछ नहीं होता।
