कुछ कविताएं मन में उठे किसी विचार को शब्द देती हैं और कुछ रोजमर्रा की जिंदगी के बीच छूट गई चीजों की ओर फिर से देखने का अवसर देती हैं। विनोद दूबे का कविता संग्रह वीकेंड वाली 52 कविता इसी तरह के अनुभवों, स्मृतियों और जीवन से हुए संवादों का संग्रह है। यह उनका पहला कविता संग्रह है, जिसमें 52 कविताओं को अलग अलग भावभूमियों में रखा गया है।

संग्रह में गांव की स्मृतियों से लेकर शहर की भागदौड़, प्रकृति, रिश्ते, प्रेम, जीवन के अनुभव, कोरोना काल और जहाजी जीवन तक कई विषय आते हैं। कवि ने अपने अनुभवों को किसी निश्चित क्रम या लेखकीय योजना में बांधने के बजाय उन्हें उसी सहजता से लिखा है, जैसे जीवन में अनुभव आते हैं।

इन कविताओं की भाषा आम बोलचाल के करीब है। इसलिए इनमें बड़े विचार भी परिचित दृश्यों और रोजमर्रा के अनुभवों के बीच दिखाई देते हैं। कहीं मनुष्य अपनी ही बनाई दौड़ पर विचार करता है तो कहीं गांव, बारिश, छुट्टियां और स्मृतियां उसे अपने भीतर लौटने का अवसर देती हैं। संग्रह की यही विविधता इसे अलग अलग मनःस्थितियों से गुजरते पाठक के लिए एक सहज पाठ बनाती है।

वीकेंड वाली कविता की कुछ कविताएं

  1. प्रेमचंद

एक ख्वाहिश है,
कि कभी जो तुम एक दोस्त बनकर मिलो,
तो कुल्हड़ में चाय लेकर,
तुम्हारे साथ सुबह का कुछ वक्त गुजारूं,
तुमसे बातें करते शायद देख पाऊं,
तुम्हारी आंखों में छुपे वो सारे राज,
जो लाख कोशिशों के बावजूद,
तुम्हारे अंदाज में नहीं देख पाया,
ये तुम्हारा समाज…

मसलन, छोटे से गांव का एक मेला,
जो बच्चों के लिए महज खिलौनों
और मिठाइयों की दुकान में होता है सिमटा,
उसी ईदगाह के मेले में, कैसे दिख जाता है तुम्हें,
वो नन्हा सा हामिद,
अपनी बूढ़ी दादी के लिए खरीदता,
एक तीन आने का चिमटा…

घूसखोर नौकरशाहों के समाज में,
जहां हमें अंदाजा भी नहीं,
कि कोई ईमानदार अफसर भी कहीं होगा,
कैसे मिल जाता है तुम्हें वो एक बंशीधर,
सेठ अलोपीदीन के पैसों के सामने चट्टान सा खड़ा,
तुम्हारा वो नमक का दारोगा…

एक समाज जहां…
बदले की भावना का फैशन हो,
लोग बेधड़क रच लेते हों,
“जैसे को तैसा” का षड्यंत्र,
कैसे मिल जाता है तुम्हें वो बूढ़ा बेसहारा भगत,
अपने इकलौते बेटे के हत्यारे के बेटे में,
जो निःस्वार्थ फूंक देता है, जीवन का मंत्र…

एक समाज जहां…
मां बच्चे की उंगली पकड़कर,
सिखाती हो गिरना और संभलना,
तुम्हें कैसे दिख जाती है वो बूढ़ी काकी,
और उसका बचे-खुचे खाने में,
पूड़ी-जलेबी के टुकड़े तलाशना…

एक समाज जहां…
गरीबी के किस्से आम से लगते हों,
मन में क्यों चिपकी रह जाती है,
सिर्फ तुम्हारी लिखी हर बात,
कफन के पैसे से शराब पीते आज भी,
नजर आते हैं कहीं घीसू और माधव,
तो किसी खेत में पड़ा कोई हल्कू,
ठंड में आज भी गुजार लेता है पूस की एक रात…

जिस देश में उसका राजा सबको,
सिर्फ हिन्दू या मुसलमान दिखाई देता है,
ना कायदे से कोई परीक्षा होती है,
ना परीक्षकों में सुजान सिंह जैसा कोई,
वफादार दीवान दिखाई देता है,
उसी देश में कैसे मिल जाते हैं तुम्हें,
अलगू चौधरी और जुम्मन मियां
कैसे समझ लेते हो तुम,
कि इंसान जब पंच बनता है,
तो सिर्फ इंसान नहीं रह जाता,
वो परमेश्वर बन जाता है,
सिर्फ हिन्दू या मुसलमान नहीं रह जाता…

चाय की आखिरी चुस्की से पहले,
ये सब मुझे पूछना है तुमसे,
और फिर जाने से पहले तुम्हें गौर से देखना है,
देखना चाहूंगा…

बिना धनपत राय के धन के,
बिना नवाब राय की नवाबी के,
कैसी थी तुम्हारी तकदीर,
एक फटा हुआ जूता,
और मटमैले कुर्ते में लिपटा,
कैसा था तुम्हारा वो दुबला शरीर,
जिसने महज छप्पन सालों में तैयार कर दी,
कहानी, नाटक और उपन्यासों की,
इतनी बड़ी जागीर…

जब हास्य लिखा, तो हंसा दिया,
जब दर्द लिखा, तो रुला दिया,
सिर्फ एक फिल्म लिखी, सोजे वतन,
उस पर भी दंगा करा दिया,
इतनी अलग विधाओं में,
इतना कुछ कैसे लिख पाए,
प्रेम और कल्पना में लिपटे साहित्य को,
वास्तविकता की धूप में कैसे खींच लाए,
और आखिर में,
छूना चाहूंगा एक बार तुम्हारी दवात में रखी,
भावनाओं की वो जादुई स्याही,
नमन है तुम्हें मुंशी प्रेमचंद,
तुम्हीं हो सही मायने में,
कलम के सिपाही।

  1. ऑप्शन

हमेशा दो ऑप्शन रहते हैं,
एक का साथ दिया,
तो दूसरे को रहता है गिला,
दोनों को गर वह दिया,
तो खुद के लिए कुछ ना मिला।

क्लास की पिछली बेंच पर बैठ,
खिड़की से बाहर देखते रहे,
तो रिजल्ट में फर्स्ट आना रह गया,
फिर आगे बैठकर जो टॉपर बने,
तो बेंच पर कई खूबसूरत स्केच बनाना रह गया।

हॉस्टल जाते, मां के दिए
सामानों की पोटली सहेजने में,
मां को गले लगाना रह गया,
टाइम से स्टेशन पहुंच ट्रेन में सीट तो ले ली,
पर हड़बड़ाहट में पिता का पैर छूना रह गया।

इश्क की नदी में हम अपनी मर्जी से डूबे,
और पीछे ये दुनिया रूठने लगी,
जब सात फेरों की जिम्मेदारी कबूल की,
तो कलम से वो शायरियों की स्याही सूखने लगी।

सुबह का वक्त कपालभाति में गुजारा,
तो चाय पर पत्नी के विचार छूट गए,
कॉर्नफ्लेक्स और फ्रूट प्लेट में रखे,
तो आलू के परांठे और नींबू के अचार छूट गए।

जो वीकेंड में परिवार के साथ डिनर किया,
तो दोस्तों की बेफिक्र संगत में बहकना रह गया,
जो उन कमीनों से मिलके लड़खड़ाते लौटा,
तो घर आकर सच्चाई और खुशी से चहकना रह गया।

उस स्टार्टअप के काम में मजे थे,
पर पैसों की कमी हमेशा खलती रही,
नौकरी बदलकर पैसे कमाए,
पर रातों की नींद कहीं चलती बनी।

परिवार को आगे बढ़ाने की ख्वाहिश में,
मैं दिन-रात काम में जुटता गया,
बच्चे बड़े होकर आगे बढ़ गए,
बालों की सफेदी लिए मैं खुद पीछे छूटता गया।

इतनी बड़ी दुनिया
और मेरे छोटे-छोटे हाथ,
सब कुछ बटोरने के चक्कर में,
कुछ रख ना पाया साथ…

अब समझ आता है कि,
सब कुछ हासिल कर लेने की चाह,
नियति से बहुत बड़ी बेईमानी है,
कुछ ना कुछ हमेशा छूट जाना ही,
शायद इंसान होने की निशानी है।

  1. उन बोरिंग सी छुट्टियों के नाम

कितना कुछ करने को होता है,
उन जगहों पर, जहां करने को कुछ नहीं होता…

सुबह देर तलक बिस्तर पर ऊंघते,
उन लकीरों को छूना,
जो खिड़की से छनकर आती रोशनी
चेहरे पर बनाती है,
फिर उठकर बेपरवाही से बालकनी में बैठना,
टीवी और स्मार्टफोन की दुनिया से दूर इन आंखों को,
पहाड़ों पर जमी पेड़ों की काई को तकते सुकून देना,
ट्रैफिक की चिल्ल-पों से दूर,
कोयल की आवाज को बेवजह दुलराना,
और फिर चाय की चुस्की को कुछ यूं महसूस करना,
जैसे हरेक घूंट के साथ ये सारा मंजर,
नसों में घुलता जाता हो…

कितना कुछ करने को होता है,
उन जगहों पर, जहां करने को कुछ नहीं होता…

दिन चढ़ते ही इन जंगलों में, पहाड़ों पर
बेमकसद, बेमंजिल घूमते रहना,
“मैं कर क्या रहा हूं” जैसे सवालों को बेधड़क पूछना,
इस उम्मीद में कि शायद पहाड़ों से टकराते सवाल,
कोई मुकम्मल जवाब लेकर लौटें,
रिश्तों की उलझी कई पुरानी गांठें खोलना,
इस बहाने, मन पर मैल की सारी परतें मिटाना,
“मैं ही हमेशा ठीक हूं” जैसी बेफिजूल शर्तें हटाना,
और फिर ढेरों मुश्किल सवालों के आसान जवाब लिए,
शाम फिर उसी बालकनी में चाय की सोहबत में लौट आना…

कितना कुछ करने को होता है,
उन जगहों पर, जहां करने को कुछ नहीं होता…

शाम की हल्की बारिश में,
कचनार और गुलमोहर के फूलों पर,
बूंदें फिसलते देखना,
पहली बारिश में मिट्टी से,
रात रानी के फूल की खुशबू बिखरते देखना,
और फिर बिस्तर पर लेटे,
खिड़की से देखना चांद का रूमानी अंदाज,
चैखुर और कीकर की अंधेरे में गूंजती आवाज,
उस आखिरी रात, बच्चों सी गहरी नींद में टूटकर सोना,
जैसे सारी कायनात लोरी सुनाती हो,

कितना कुछ करने को होता है,
उन जगहों पर, जहां करने को कुछ नहीं होता…

एक बार फिर लौट आना,
उसी पुरानी दुनिया में,
जहां स्मार्टफोन के स्क्रीन की सोहबत में सुबहें गुजरती हों,
चाय के साथ लैपटॉप पर ऑफिस की जिम्मेदारियां निभती हों,
ईमेल और फोन कॉल की बातें,
जिंदगी के मायने बताती हों,
रिश्ते फिर उलझने लगते हों,
सवालों की लड़ी फिर से मन में कुलबुलाती हो,
मन में मैल की काई सी जमती जाती हो,
मखमली बिस्तर पर भी ठीक से नींद नहीं आती हो,
काश वो सुस्ताती सी पहाड़ों की जिंदगी, मेरा झूठ,
और ये दौड़ती-भागती सी जिंदगी, मेरा सच नहीं होता,

कितना कुछ करने को होता है,
उन जगहों पर, जहां करने को कुछ नहीं होता…

  1. बारिश वाली सुबह

सुबह रोज आती है,
एक नए लिबास में…
पर बारिश वाले ब्रांड की परफ्यूम लपेटे,
आज काफी दिनों बाद आयी,
या फिर शायद मैंने ध्यान ना दिया हो…

अनजान से इस पार्क की,
सूनी सी वो झोपड़ी,
कितना कुछ कहने को होगा इसके पास,
किसी खाट पर पड़ी दादी अम्मा की तरह,
पर कोई पास बैठता ही नहीं…

आज मेरे पास भी खालीपन के सिवाय कुछ नहीं है…
इस खालीपन की सौतन मोबाइल फोन भी नहीं…

सर्दी जुकाम के डर से ही सही,
मैं इस झोपड़ी में बैठा तो हूं…

लम्बी और नुकीली ठोर वाली गौरैया,
किसी फाइटर प्लेन की तरह उड़कर गुजरती है,
जैसे बेफिक्री की नुमाइश कर रही हो…
मुझे सालों हुए, यूं बेफिक्र उड़े हुए…

गुड़हल के पेड़ दूर कोने में,
अपनी हरी पत्तियों से मशविरा कर रहे हैं,
मुझे सालों हुए किसी से यूं डूबकर बात किए हुए…

कनेर के गुलाबी और पीले फूल,
एकटक निहारते हैं मुंह बाये,
बारिश की हर बूंद को…
मैंने सालों हुए कुछ भी यूं तल्लीन होकर देखे हुए…

सुबह से रात तक,
एक सफर मैं रोज तय करता हूं,
पर कुछ भी डूबकर नहीं करता,
ना अदरक वाली चाय का जायका,
ना रिश्तों की गरमाहट का अहसास,
कुछ भी नहीं है मेरे पास…

हर चीज को वक्त देना होता है,
तली की गहराई तक डूबना होता है,
और मैं सिर्फ सतह को छू कर गुजरता हूं,
तैर कर नदी पार की जाती है,
पर बिना डूबे महसूस नहीं किया जाता…

  1. खामोशी की आवाज

यूं ही हंसते-हंसते कहा था मैंने,
कि कभी खामोशी की आवाज सुनी है तुमने,
और तुम्हें कितनी शिकायत थी इस बात से,
कि घंटों चुपचाप बैठती हो,
फिर भी खामोशी का एहसास कहां होता है…

एक बार आंखें मूंद के सोचो,
ये आवाज कहां-कहां छोड़ आयी थी तुम?

दार्जिलिंग की चाय के बागान पर,
उस रोज जब महीन सा कोहरा बरस रहा था,
सुबह-सुबह पत्तों पर टिप-टिप गिरती
ओस की बूंदें सुन पाती,
तो शायद समझ पाती
कि खामोशी की भी एक आवाज होती है।

जैसलमेर की उस सर्द चांदनी रात में,
हवा के झोंकों को रेगिस्तान के कीबोर्ड पर,
सरगम बजाते सुना होता तुमने,
तो शायद समझ पाती
कि खामोशी की भी एक आवाज होती है।

अंडमान के नीले समंदर के शांत चेहरे पर,
उस शाम नन्ही लहरों के आहिस्ता से पड़ते,
कदमों की आहट सुनी होती तुमने,
तो शायद समझ पाती
कि खामोशी की भी एक आवाज होती है।

शिमला की बर्फबारी से नहाई वादियों में,
उस गुनगुनी दोपहरी में जब चम्पई धूप बरस रही थी,
बर्फ के गोलों को आहिस्ता आहिस्ता
पानी बनते सुना होता तुमने,
तो शायद समझ पाती
कि खामोशी की भी एक आवाज होती है।

अबकी फिर जो ऐसा कोई वक्त टकराए,
तो चंद लम्हों के लिए तुम अंदर से मौन हो जाना,
फिर शायद तुम खामोशी की आवाज सुन पाओगी,
एक बार ही सही, इस आवाज में डूब के निखर आओगी।

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