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13.September.2025

डियर X,

आज की सुबह में धूप और हवा का अनूठा संगम है। विरोधाभासी चीज़ें जब एक साथ आती हैं तो आनंद का स्वाद ही कुछ और होता है—खट्टे-मीठे-नमकीन की तरह। आज लगता है जैसे प्रकृति अपने आँचल में रखा सब कुछ एक साथ लुटा देने को मेहरबान हो। हवाएँ इतनी तेज़ हैं कि खिड़की खोलते ही कागज़ के पन्ने उड़ जाते हैं। कई बार लगता है कि प्रकृति हमसे कितने तरीक़ों से बात करना चाहती है—जैसे खिड़की की ओट से मेरे पन्नों को छेड़कर कह रही हो, “रुककर मेरी आवाज़ सुनो।”

पर हम? हम अपनी दुनिया में इतने आगे निकल चुके हैं कि इन साधारण संदेशों की आवाज़ कान के परदों को झंकृत तक नहीं करती। मैं खिड़की से देखता हूँ। सामने पेड़ के नीचे एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा है। एक छोटी-सी कुर्सी लगाकर धीरे-धीरे झाड़ियों से खरपतवार हटा रहा है ताकि बेलें खुलकर मुस्कुरा सकें। उसकी तल्लीनता मुझे मोहित करती है। सोचता हूँ—इतना साधारण-सा काम भी कोई इतनी लगन से कैसे कर सकता है?

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