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18.October.25

डियर X,

थोड़ी देर पहले मौसम की फुहार थी। मैं पन्ने समेटने की कोशिश में था। और अब तेज धूप निकल आई है। हृदय की रेखा जैसी साइन कर्व है ज़िन्दगी । कभी ठंडी फुहार तो कभी त्वचा को चुभती धूप।

वैसे तो मुश्किलों की धूप हम सब की ज़िंदगी का क़िस्सा है। पर यह कम्बख़्त धूप भी कभी-कभार इतनी तेज़ होती है कि चेहरे पर जलन की परछाई छोड़ जाए। चेहरे पर एक कृत्रिम मुस्कान चस्पा किए हम सारा दर्द भीतर समेटे रहते हैं। यह झूठ कई दफ़ा शरीर को भीतर से थका देता है। शाम होते हुए जैसे पंक्षी घोसलों की ओर उड़ जाते हैं, इस थकावट में मुझे भी घर याद आता है ।

प्रवासियों को घर कब नहीं याद आता होगा । हर गम और ख़ुशी में तो आता ही होगा। दिवाली का मौसम है। चमक-धमक है। पर इन सबके पीछे झिलमिलाती सी रौशनी में बचपन का घर है। घर जो लगता है प्रकाश वर्ष पीछे छूट गया। गाँव के एक किनारे, पीले रंग की दीवारों में बसा वह चंद कमरों का मकान भर नहीं था, मेरी सारी थकान का इलाज़ था।

“आ गए? धूप में रंग साँवला होता जा रहा है, कहाँ दिन भर मारे – मारे फिरते हो। चलो, बैठो चुपचाप “उसकी पुरानी दीवारें दूर से ऐसे बुलाती थीं जैसे खेलकर थके हुए शिशु को माँ डाँटकर अपने पास बुला रही हो ।

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