डिअर X,
साल जैसे-जैसे समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, स्मृतियों को पकड़ने का मन तेज़ होता जा रहा है। नॉस्टेल्जिया संवेदनशील लोगों के साथ जीवन भर चलता है। इस साल कितना कुछ किया, कितनों से मिला, कितनी यात्राएँ कीं, कितना लिखा-पढ़ा—सब कुछ किताब के पन्नों की तरह सामने पलटता जा रहा है। जो हासिल किया, उसकी ख़ुशी है; किंतु जो लौटकर नहीं आएगा, उसका दुख भी है। और सच कहूँ तो लेखकों ने दुख को ज़्यादा पोषा है।
दुःख से अघाया मन ख़ुशी की तलाश में भटकता है। मैं अपने हाथ में अपनी नई किताब कस्तूरी उठा लेता हूँ। “कस्तूरी”—गुज़रे साल भर की भावनाओं की जमा-पूँजी। इसे पलटना, इसकी कविताओं से बार-बार गुज़रना मन को ख़ुशी देता है।
भावनाएँ भीतर हैं; इनका कुछ किया नहीं जा सकता। ट्रेन में दोस्तों संग चहचहाते हुए भी किसी उदास, चुप बैठे इंसान पर नज़र पड़ जाती है, और सारी ख़ुशी काफ़ूर हो जाती है। यह अजीब-सा एहसास है—एक ऐसे व्यक्ति से, जिससे मेरा कोई नाता नहीं, फिर भी उसकी पीड़ा मुझे भीतर तक छू जाती है। शायद यह संवेदनशीलता भीतर की किसी डिफ़ॉल्ट सेटिंग-सी प्रतीत होती है।
इन भावनाओं को शब्द देना मैंने गुरुओं से सीखा—माँ से, शिक्षकों से, जिन्होंने ककहरा, व्याकरण, समास और अलंकार सिखाए। मुझसे पहले के लेखकों से लेखन का शिल्प सीखा, और सीखना बदस्तूर जारी है। मेरे लेखन में सबका कुछ-न-कुछ अंश है। किंतु लेखन जो डायरी के पन्नों से बाहर निकलकर किताब की शक्ल ले पाया है, उसका सबसे बड़ा श्रेय मेरे पाठकों को जाता है।
यह किताब उन्हीं पाठकों को समर्पित है, जिन्होंने मुझे लेखक बनाया। मेरे लिखने में भले उनका प्रत्यक्ष हाथ न हो, पर मेरे छपने के आत्मबल में सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं का योगदान है, जिन्होंने भरोसा दिलाया कि मेरा लिखा उनके मन की भावनाएँ समेटे हुए है। मैं कभी नहीं चाहूँगा कि आप मुझे इसलिए पढ़ें कि आप मुझे जानते हैं। मैं चाहूँगा कि अगर आपके भीतर भावनाएँ प्रबल हैं, शब्दों से प्रेम है, और मेरा लिखा आपको अपने मन-सा लगता है—तभी आप इसे पढ़ें।
यह साल—2025—मेरे लिए स्वयं की तलाश का साल रहा। अपनी प्राथमिकताओं को पहचानने का, लोगों और अपेक्षाओं की अनावश्यक शाखाओं की छँटाई का, ताकि मन की डालियाँ बोझिल न हो जाएँ। यह बात अब पुख़्ता होती जा रही है कि ख़ुशी बाहर नहीं, भीतर है; कस्तूरी मृग की तरह अंतर्यात्रा ही सुकून का उपाय है। शायद इसी सोच का निचोड़ है कस्तूरी—इस साल मन के भीतर चल रहे विचारों का सार।
कहते हैं, सिंगापुर में लोग सबसे तेज़ चलते हैं। यह इस तेज़ रफ़्तार शहर की सीरत है। यहाँ खरीद-फ़रोख़्त में व्यस्त लोगों के बीच साहित्य को समझने का दिल होना ही बड़ी बात है। और अगर दिल हो भी, तो पढ़ने का समय निकाल पाना—वह अलग ही दुश्वारी है। ऊपर से यह कोई रोचक कहानी या उपन्यास नहीं, बल्कि कविताएँ हैं—जिन्हें कम शब्दों में बहुत कुछ गूढ़ कहने की ज़िम्मेदारी होती है। एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा—कुछ वैसा ही। इसलिए सिंगापुर में जो लोग मेरी हिंदी में लिखी कविताएँ पढ़ते हैं, उन्हें पसंद करते हैं—उन सबको विशेष नमन।
विदा
वीकेंड वाली चिट्ठी

