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22.November.25

डिअर X,

मलेशिया में हूँ। छुट्टियों के दिन हैं। या यूँ कहूँ कि ज़िंदगी की आपाधापी से मोहलत के दिन हैं। सामने एक बड़ा-सा स्विमिंग पूल है। बच्चे पानी में बूंदों की तरह खिलखिला रहे हैं। पीछे एक खुला-सा काउंटर है, जहाँ पिज़्ज़ा और ड्रिंक्स का इंतज़ाम है। सुबह की हवा में हल्की-सी नमी है, और उसी में मिलती हुई संगीत की झनकार—पूरे पूल के वातावरण में गुंजायमान है।

पर इतने शोर, रंग और रौशनियों के बीच… मैं एक कोने में बैठकर, कॉफी की चुस्कियों के साथ तुम्हें ये चिट्ठी लिखना चुनता हूँ। हमेशा की तरह यह मेरा अपना चुनाव है। फुरसत के इन बेशकीमती पलों में—इस सुख को जीते हुए एक सवाल भीतर गूंजता रहता है: आखिर कौन-सा सुख है, हमारे जीवन का उद्देश्य? आनंद? प्रतिष्ठा? संघर्ष? ईश्वर? मोक्ष? या फिर कुछ भी नहीं?

दिनचर्या के चक्करों में, ऑफिस–घर के फेरों में, इस सवाल से आमना-सामना करने का वक़्त ही कहाँ मिलता है। मुझे नहीं पता—क्या तुम्हारे अकेलेपन में भी ये सवाल धीरे से दस्तक तुम्हें देते होंगे?

सच कहूँ तो… कई बार मैं चाहता हूँ कि ईश्वर, पुनर्जन्म, कर्म—इन सब पर मैं बस आँख मूंदकर यक़ीन कर लूँ। ताकि मन में चुनाव की दुविधा न रहे। तर्क-वितर्क की जगह शेष न रहे। पर विश्वास चाहने भर से कहाँ होता है—वह तो सचमुच हो जाने से होता है।

बदकिस्मती से हम सबके पास सिर्फ उसी ज़िंदगी का ठीक-ठीक तजुर्बा रहता है, जो हमने जिया होता है। ठीक उतने ही साल का तजुर्बा, जितने साल हम जी चुके। न रत्ती भर कम न ज़्यादा। उसी अनुभव की गवाही देकर सच कहूँ तो ज़िंदगी ने बहुत रैंडम (बेतरतीब) तरीके से करवटें लीं। मैंने लाख कोशिश की किन्तु किसी भी पैटर्न को नहीं जोड़ पाया। कर्म के कुछ डॉट जोड़ने की कोशिश करता, ज़िंदगी अगली बार कुछ और ही बना देती। मानो कह रही हो—मुझे समझने में वक़्त क्यों गँवाते हो। मुझे नहीं समझ पाओगे, बेहतर है, ठीक से जीवन जी लो। कभी समझ नहीं आया कि सच क्या है, और किस पर भरोसा करें। कर्मयोग में कहा गया—सब कर्म का फल है। अच्छे लोग परेशान दिखते हैं—तो कहा जाता है कि उन्होंने किसी जन्म में किसी को परेशान किया होगा। जो समझ में नहीं आता, वह पिछले जन्म का फल है। काश! कोई पिछले जन्म का बैंक स्टेटमेंट भेज देता?

जो कहा गया, उससे दुनिया कितनी अलग मिली। हम मिडिल-क्लास परिवारों में कितनी बार कहा गया कि पैसे से सुख नहीं मिलता। किन्तु पूरी उम्र पैसे की ताक़त आँखों के सामने दिखती रही। भला, किसी और के तजुर्बे पर कैसे यक़ीन करें? अच्छा करो, अच्छा होगा—सिर्फ सुनता रहा। अच्छे लोगों को दुखी देखता तो मन में प्रश्न उठना लाज़िमी था। कभी-कभी लगता है जैसे यह दुनिया एक अजीब-सी समानांतर सच्चाई बन गई है। जो बताया जा रहा था—एक वह दुनिया। जिससे मैं रूबरू था—एक वह दुनिया। मेरे साथ-साथ चल रहे थे पर कितने विपरीत थे। दिल पर हाथ रखकर पूरी सच्चाई से कहना—क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगा?

कुछ वर्षों पहले मेरी मुलाकात एक कोरियन पायलट से हुई। पहली दफ़ा किसी ने कहा था—“I don’t have any God.” तब मैं चकित रह गया था। मुझे लगा था—आज शाम को बजरंगबली आएँगे और एक गदा लगाएँगे, उस कोरियन की बुद्धि ठिकाने आ जाएगी। तब से अब तक कितना वक़्त बह गया। मैं बदला तो नहीं—बस थोड़ा-थोड़ा खुलता रहा। इस देश में, जहाँ मैं आज हूँ—यहाँ एक बड़ी चीनी आबादी है। उनकी नई पीढ़ी से बात करता हूँ, तो पाता हूँ कि उनके लिए जीवन सिर्फ विज्ञान का एक नियम है। सही-गलत आपकी चॉइस है। शादी, बच्चे—सब समाज के बनाए ढाँचे हैं। जीवन गुज़र जाने के लिए हुआ है। इसमें सिर्फ यही पैटर्न निश्चित है और कुछ भी नहीं। इनकी बातें कई बार अजीब लगती हैं। मन में जमे विचारों की रस्सी को झटका-सा देती हैं।

मेरे भीतर मेरा ईश्वर, मेरा देश इतनी गहराई से बसे हैं कि बिना प्रमाण के भी उन पर विश्वास करने का मन करता है। पर फिर लगता है—बिना प्रमाण के यह विश्वास कब तक टिके रहेगा? आस्था के भी फ़ायदे होंगे। हम सबके कमज़ोर क्षणों का सहारा बन जाती है। एक किताब पकड़ ली, एक नियम थाम लिया, एक समाज का ढाँचा अपना लिया। और फिर उसी पर टिके रहे।

पर सच कहूँ—जीवन तो बस जीने का नाम है। जो है, बस अभी है, यही है। न पहले का पता, न आगे का। और हाँ… ये सवाल मन में आते रहें तो अच्छा है। डर है कि कहीं सवाल पूछना ही बंद न हो जाए।

आज जो महसूस हुआ—लिख दिया। कभी-कभी मेरे विचारों से लोग असहमत हो जाते हैं। पर चिट्ठियाँ मेरे निजी कोने हैं—मेरे विचार—मेरी यात्रा की डायरी। मैं भी सीख रहा हूँ, समझ रहा हूँ, बदल रहा हूँ। जहाँ तक पहुँचा हूँ—वही सच है, अभी तक का। उम्मीद है, आगे की समझ थोड़ी और साफ़ होगी। जैसे-जैसे समझता जाऊँगा, लिखता जाऊँगा।

विदा,

वीकेंड वाली चिट्ठी

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