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25.October.25

डियर X,

जीवन में सबकुछ कितनी तेजी से बदलता जा रहा है—और हम रोबोट की तरह इस बदलाव के साथ चकरघिन्नी बने फिर रहे हैं । या फिर मेले का वह खिलौना बन गए हैं —जिसमें चाबी भरकर नाचने के लिए छोड़ दिया जाए। जब एक चाबी घूम रही है, तब तक नाच चल रहा है ।

अचानक, किसी रोज़ किताब पढ़ते हुए, जब नज़रों की सहूलियत के लिए पन्नों को थोड़ा दूर करना पड़ा, तब लगा कि — अरे! मेरी आँखों को क्या हुआ?

या फिर किसी रोज़ उठकर, बाहों में एक हल्का सा दर्द हुआ तो लगा — अरे! मुझे भी बेवजह दर्द होता है?

फिर आखिर में कानों के पास कुछ सफ़ेद होते बाल झाँककर आईने के ज़रिए हमें फुसफुसाकर बताते हैं — “उम्र सबकी होती है। आप यहाँ हमेशा के लिए नहीं हैं ।”

उम्र गुजरने का भय हमेशा जो है उसे कसकर पकड़ने को मज़बूर करता है। दिवाली का समय है — घरों में दियों की चमक है, मुहल्लों में पटाखों की धमक है, फ़िज़ाओं में मिठाईयों की गमक है। भला, कितनी दिवालियाँ इसी तरह बीतीं — सोचकर होंठों पर मुस्कान तैर जाती है। हम ना जाने कितने करीबियों को जानते हैं — जो पिछली दिवाली थे, और अब नहीं। और हम में से कई ऐसे हैं जो इस बार हैं, और अगली दिवाली शायद ना हों।

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