डिअर X,
फिलहाल गुज़री दिवाली की महक फ़िज़ाओं में अब भी बाक़ी है। मिठाइयों का जायका जीभ पर चढ़ा हुआ है, और कानों में नींद में भी पटाखे गूंज रहे हैं।
सुबह टहलने निकलो तो डस्टबिन के पास कुछ बुझी फुलझड़ियाँ मिल जाती हैं — जैसे त्यौहार खुद कह रहा हो, “अभी मैं गया नहीं हूँ!” त्योहारों का यही तो जादू है — उनकी बयार कुछ दिनों पहले से लेकर कुछ दिनों बाद तक चलती रहती है।
पर जैसे-जैसे हम “संपन्न” हो रहे हैं, वैसे-वैसे त्योहारों के रूप भी बदलते जा रहे हैं। सब कुछ अब पहले से ज़्यादा अच्छा, ज़्यादा चमकदार, ज़्यादा “इंस्टाग्राम-योग्य” हो गया है — कपड़े, गहने, सजावट, दीये, मिठाइयाँ — सब कुछ परफ़ेक्ट फ़्रेम में फिट बैठता है। कहीं कुछ भी बेतरतीब नहीं। सुतली बम की जगह अब फुलझड़ियाँ चलती हैं — वो भी बैकग्राउंड म्यूज़िक और रील टाइमिंग के साथ।
इसी बीच, एक मित्र मिले। चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन भीतर से सताये हुए लग रहे थे। बोले — “भाई, इस बार की दिवाली ने तो थका डाला! पत्नी के कहने पर इतने घर घूम आया कि अब जड़त्व के नियम को चुनौती दे रहा हूँ — बस लेटा ही रहना चाहता हूँ।”

