डियर X,
जिस पार्क में बैठा हूँ, चिड़ियों से ज़्यादा बच्चों का कलरव है। इस वीकेंड लगता है, तमाम पेरेंट्स अपने शिशुओं को लिए इसी पार्क में आ गए हैं। एक नन्हा-सा बच्चा साइकिल चलाने की कोशिश कर रहा है। माता-पिता, शायद अपना पहला अभिभावक अनुभव जीते हुए, उसे साइकिल चलाना सिखाने की कोशिश में हैं।
उस बालक के शरीर पर इतने सेफ़्टी गियर लगा दिए गए हैं, जैसे राणा प्रताप हल्दीघाटी जा रहे हों। माँ के चेहरे पर चिंता की लकीरें हैं, और पिता का द्रोणाचार्य रूप मैं साफ़ देख पा रहा हूँ।
बच्चा साइकिल शुरू करता है और लड़खड़ाकर गिर जाता है। पिता नाराज़—जैसे धरती ने घूमना बंद क्यों नहीं कर दिया? हमारा फूल-सा बच्चा गिर गया और दुनिया को खबर तक नहीं! माँ ने भी मुझे ऐसे तिरछी नजरों से देखा, जैसे कह रही हों — “बेंच पर बैठकर कागज़ काले करने से अच्छा था, आकर मेरे बच्चे के घुटने और ज़मीन के बीच अपना घुटना लगा देते!”
खैर, माता-पिता के पास आते ही बच्चा मुस्कुराते हुए धूल झाड़कर फिर खड़ा हो जाता है। सबकुछ पहले जैसा। जीवन फिर से चल पड़ता है।
यह दृश्य कितना सामान्य है — सिर्फ इस पार्क का नहीं, पूरी दुनिया का। बच्चा कहीं हारकर लौटता है, तो माँ दौड़ पड़ती है—आँचल का सुकून लुटाने को। बाप कहता है— “कोई बात नहीं… और मेहनत करो…कुछ और बेहतर नसीब में लिखा होगा।” वे दोनों अपने जीवन के सारे अनुभव स्नेह की पुड़िया में डालकर उसके उत्साह को फिर जगाना चाहते हैं।
जरा सोचिए— जब हम बड़े हो जाते हैं, तो कौन हमें इस तरह का स्नेह देता है? क्या बड़ों के भीतर यह चाहत नहीं रहती, कि जब ज़िंदगी की थकान में उलझें तो कोई माथा सहला दे और कान में कह दे— “शाबाश! तुम बहुत अच्छा कर रहे हो।” पर… हमारे पास कोई नहीं। हम अपने माँ-बाप से दूर जीवन संवारने निकलते हैं— तो जीत-हार हमारे हिस्से भी आती हैं। पर भीतर चल रही भावनाओं के शैलाब को कोई समझने वाला नहीं होता। अकसर लगता है — हमारे होने या न होने से किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ता। और तब लगता है — हर कोई हमें ग्रांटेड लेता है। यह किसी आत्मा के लिए कितना झिझक भरा एहसास है।
दिन भर पिता ऑफिस की ज़द्दोजहद में जिस परिवार के लिए उलझते हैं, घर लौटकर वही लोग अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त। किसी के पास इतना भी समय नहीं— “आज कैसा रहा आपका दिन?” पूछने का। साल-दर-साल वह वही काम करते हैं, ताकि परिवार खुश रहे।
माँ सुबह से सबके स्वाद की चिंता में लगी रहती है। पर कोई नहीं कहता— “बैठ जाओ… सांस लो… आज तुम नहीं, हम बनाएँगे।” या फिर— “वाह! क्या बढ़िया स्वाद है!” बस इतना सा ध्यान ही तो चाहिए उस मन को जिसने खाना पकाना कभी सपना नहीं, बस जिम्मेदारी समझकर निभाया है।
जब प्रेम की एक बूंद भी न गिरे इस प्यासी आत्मा पर— तो मन भारी हो उठता है। हम जिनके लिए चुपचाप सब करते हैं, जब वही हमारे किए का महत्व न समझें— तो यह कितना निरीह कर देने वाला अनुभव है।
जब मन की बात किसी से न कह सकें तो अकेलेपन के क्षणों में वही विचार धौंकनी-सी हवा देते हैं— राख में दबी चिंगारी को भड़काते रहते हैं। अंदर एक टीस उठने लगती है— बिना नियंत्रण, बिना शोर।
पर माने न माने सच तो यही है— यह जीवन हमारा अकेले का है। सुख-दुख भी हमारे अपने— और उनसे निपटना भी हमीं को पड़ेगा।
ऐसे क्षणों में साँसों पर ध्यान लगाकर वर्तमान में लौटना होता है — खुद की ओर। पूरी तरह। टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं। दुख के हर रेशे को खोलकर उसकी कोर तक जाना होता है— जैसे आप प्याज़ के छिलके उतार रहे हों, चाहे जितने आँसू निकले।
अंत में समझ आता है— आए थे तो अकेले, जाएँगे भी अकेले। रिश्ते भी हमने जोड़े, अपेक्षाएँ भी हमने रखीं— तो टूटने का दुख भी हमारी ही रचना है। डिटैच होकर जीना— यह सबसे कठिन साधना है। घर की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए हम चाहे कितने भी निस्वार्थ हों, एक छोटी-सी उम्मीद फिर भी बनती है— “तुम बहुत ज़रूरी हो…” पर विडंबना यही— उम्मीद ही दर्द की सबसे बड़ी जड़ है। जीवन जितना स्वयं पर केंद्रित होगा— उतना ही सुकून देगा। हम अपने मन को ही काबू में नहीं रख पाते— तो दूसरों के व्यवहार पर कैसा नियंत्रण? और जो नियंत्रण में ही न हो— उससे कैसी पीड़ा?
हमें लगातार खुद पर काम करना है— अपनी आदतों, अनुशासन, पसंद-नापसंद पर। खुद से पूछना है— क्या सच में हमारे पास अपने लिए समय है? जीवन कोई न्यायालय नहीं— जहाँ अच्छे के बदले अच्छा ही मिले। आप जो करें— अपने मन की शांति के लिए करें। लोगों से अपेक्षा करना ही दुख है। सोचिए— दुनिया आपको क्या देगी, यह आपके वश में नहीं। पर जो भी मिले— उसे पाकर कैसा महसूस करेंगे, यह हमेशा आपके वश में है। जीवन आपका है— तो अच्छा महसूस करने की जिम्मेदारी भी आपकी।
मेरे सामने तालाब है। पानी शांत है। उसमें मुझे मेरा चेहरा दिख रहा है। उस चेहरे से मैं कहता हूँ — “पूरी दुनिया चाहे मुझे ग्रांटेड ले ले, पर मैं खुद को कभी ग्रांटेड नहीं लूँगा।” ये शब्द खुद पर कितना भरोसा दिलाते हैं। दुनिया के लिए आप चाहे जो हों— अपने लिए तो आप ही पूरी दुनिया हैं।
विदा,
वीकेंड वाली चिट्ठी

