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15.November.25

डिअर X,

पार्क के बीचो-बीच एक कॉफी हाउस में बैठकर तुम्हें चिट्ठी लिख रहा हूँ। सामने तालाब है, सूर्यमुखी का फूल है और एक चिड़िया है। एकांत के क्षण कितने अमूल्य हैं। मेरे अगल-बगल के लोगों पर ध्यान जाता है। एक इंश्योरेंस एजेंट अपने क्लाइंट को लाइफ इंश्योरेंस और तमाम तरह के प्रोडक्ट के बारे में बता रहा है। हर बात की शुरुआत “खुदा न करे कि कल को आपको कुछ हो गया” से करता है। मृत्यु के सजीव चित्रण से ही क्लाइंट भयभीत हो जाता है। मुझे लगा इंश्योरेंस एजेंट को प्रोडक्ट बेचना आता है। अपनी MBA की शिक्षा याद आ गई। बेचने पर कितना ज़ोर है?

मैं भारत के एक छोटे-से गाँव में जन्मा। दुनिया से मेरी पहली पहचान वहीं हुई। शायद इसीलिए, वह दुनिया मेरे भीतर आज भी बहुत गहरे तक बसी है। बीते वक्त के साथ शहर ने मुझ पर अपना रंग चढ़ा लिया है। किन्तु जब भी भीतर भावनाओं की मूसलाधार बारिश होती है, तो यह शहरी रंग उतर जाता है, और झाँकने लगता है मेरे भीतर का सम्पूर्ण ‘गँवईपन’। शायद उसी की वजह से “बेचने” को लेकर मैं हमेशा असहज रहा।

जब बचपन में अपने गाँव से किसी दूसरे गाँव जाना होता, तो बहुत-से नए लोग मिलते। हम किसी से मिलते, तो पहचान यूँ दी जाती — “फलाँ गाँव के, फलाँ परिवार के बच्चे।” हमारी पहचान हमारे माँ-बाप, ननिहाल, हमारी मिट्टी और हमारे सगे–सम्बन्धी होते थे। शायद लोगों को विश्वास था कि इंसान की पहचान उसके परिवेश से है। परिवेश को जान लेना मतलब इंसान को जान लेना।

फिर बड़ा हुआ… कुछेक बार शहर जाना हुआ। वहाँ जब रिश्तेदार मिलने आए तो उनके परिचय का तराज़ू ही अलग था— कौन-सी नौकरी? कौन-सा पैकेज? जिनका पद बड़ा, उनका सम्मान बड़ा। मेरी समझ की ज़मीन ही खिसक गई। मुझसे भी पूछा गया — परीक्षा में कितने मार्क्स आए? पिता क्या काम करते हैं?

वैसे तो पढ़ना-लिखना मुझे स्वभावतः पसंद था, किन्तु मेरी पहचान मेरे मार्क्स हैं, इस अतिरिक्त दबाव से मैं घबराया।

उस शहरी यात्रा से लौटकर मेरा बाल मन बड़ा उदास हुआ। मैं सोचता रहा कि वे लोग परिचय में क्या कहेंगे जो कुछ नहीं करते? या वे जो छोटा काम करते हैं? मेरे गाँव के वे सारे लोग जो समय पर खेती करते हैं और बाकी समय चुपचाप गुज़ार रहे हैं — उनका क्या? क्या उनके अस्तित्व को नहीं स्वीकारा जाएगा?

मैंने मन ही मन निश्चय कर लिया — मैं शहर कभी नहीं आऊँगा। पर इंसान सिर्फ़ निश्चय ही कर सकता है! मेरी बहनों ने सोचा था — घर में रहेंगी, कभी ससुराल नहीं जाएँगी। बचपन में हम सोचा करते — कभी स्कूल नहीं जाएँगे, बस क्रिकेट खेलेंगे — पर कॉलेज तक जाना पड़ा। न जाने कितनी बड़ी जनसंख्या अनमने होकर किसी और की नौकरी कर रही है।

ठीक वैसे ही, मुझे भी शहर जाना पड़ा और गाँव बहुत पीछे छूट गया। इतना पीछे कि स्मृतियों में भी ऐनक की ज़रूरत पड़ जाए। भले शहरीपन पूरी देह पर चढ़ चुका है, कभी-कभार मन पूछता है — हम किस दुनिया में आ गए हैं? जहाँ पूरी दुनिया एक बाज़ार है और हर इंसान एक प्रोडक्ट है। हर इंसान की ज़िम्मेदारी है कि अपने हुनर को बेचकर पैसे कमाए। जो लोग 10 डॉलर की कॉफी पी लेते हैं, लेखक से कहते हैं कि किताब का PDF दे दीजिए। शुक्र है कि लेखन मेरा शौक है, वर्ना लिखने की बजाय कॉफी बेचने के बारे में सोचना होता।

जीवन में हमें कौन-सा काम करना चाहिए? इस चुनाव के लिए एक जापानी सिद्धांत है — “इकिगाई” ।

सबसे पहले देखो — ईश्वर ने किस काम की यूनिक प्रतिभा तुम्हें दी है।

फिर — क्या उस काम को करने में तुम्हें आनंद मिलता है?

फिर — क्या उस काम से लोगों को कुछ फायदा होगा या कम से कम समाज को नुकसान तो नहीं होगा?

और अंत में — क्या इतना धन कमा लोगे कि जीवन यापन हो जाए?

प्रतिभा और आनंद पहले थे, पर यहाँ तो सीढ़ी उलटी है — सबसे ऊपर पैसा। हम बच्चों से कहते हैं — “वो काम करो जिसमें खूब पैसा हो।” संस्थाएं, लोग, रील्स, मोटिवेशनल स्पीकर — सब सिखा रहे हैं — कैसे बोलना है, कब चुप रहना है, क्या पहनना है, क्या पढ़ना है, कैसे व्यवहार करना है — जैसे हर इंसान को एक ही फ़ैक्टरी से निर्मित कर देंगे। मैं सोचता हूँ — क्या होगा हमारी निजता का?

और उस पर एक और मज़ेदार बात है। जो लोग जीवन में बेहतर कर रहे हैं, वे हर इंटरव्यू में कहते हैं — “अपने मन की सुनो। अपनी uniqueness पर काम करो! नक़ल मत करो।” और दुनिया कहती — “नहीं! वही करो जिसकी डिमांड है!”

सप्लाई और डिमांड पर किताबें लिखी जा रही हैं। MBA की डिग्रियाँ थमाते हुए कहा जा रहा है — जाओ, यह दुनिया बाज़ार है और तुम प्रोडक्ट हो। खुद को चमकाओ और महँगे दामों में बिक जाओ।

मैं सोचता हूँ कि यह विरोधाभास क्यों? शायद इसलिए कि हम में से ज़्यादातर निम्न–मध्यम वर्ग से आए हैं — हमने नीचे की आर्थिक खाई देखी है। डरते हैं कहीं पैर फिसले और वापस न गिर पड़ें। और एक हमसे ऊपर के स्तर की दुनिया — सुनहरी और चमकीली। इतनी सुंदर कि मन में हमेशा वहाँ पहुँचने की लालसा रहती है। नीचे गिरने का डर और ऊपर चढ़ने की लालसा — दोनों हमें अधीर कर देते हैं। जिसका मन अधीर है, उसे कोई भी नचा सकता है। नाचना है या नहीं — फैसला आपका है।

किसी न किसी स्तर पर आप हमेशा रहेंगे। कई आपसे ऊपर होंगे और कई आपसे नीचे। वैसे भी सफलता सिर्फ पैसे की तो नहीं। स्वास्थ्य, धन, रिश्ते और आपका मन — यह सब अगर ठीक तरह से हैं तभी जीवन की चारपाई पर आप पसरकर लुत्फ़ उठा सकते हैं। मन का काम करते हुए, कम ज़रूरतें रखकर और जीवन को पूरी समग्रता में जी पाएँ, तो वही सफलता है।

विदा,

वीकेंड वाली चिट्ठी

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