डिअर X,
छुट्टियों के दिन शुरू हो रहे हैं। दिसंबर में सिंगापुर सुस्ताता है। सड़कें, बसें, ट्रेन, मॉल—हर जगह जैसे अचानक लोग कम और जगह ज़्यादा हो जाती है। लगता है सारे प्रवासी पंछी किसी अस्थायी प्रवास को उड़ चले हैं।
आज ऐसी ही एक सुस्ताता-सा वीकेंड है। जिस बेंच पर मैं बैठा हूँ, उस पर धूप लकीरें बना रही है। इन चिट्ठियों को लिखते हुए तकरीबन एक साल पूरा होने को आया है। मैंने तुमसे इन चिट्ठियों के ज़रिये परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से हमेशा पढ़ने-लिखने पर ज़ोर दिया है। मन में सवाल आया कि लिखना-पढ़ना क्या इतना ज़रूरी है?
मेरे पास इसका कोई चमचमाता-सा उत्तर नहीं है। एक बात ज़रूर है कि अगर मैंने कोका-कोला नहीं पिया, तो उसे बेचा भी नहीं। कम से कम उस फिल्मी हीरो से ज़्यादा ईमानदार रहा। मैंने तुमसे ही लिखने-पढ़ने को नहीं कहा, बल्कि स्वयं भी यही किया। मेरे लिखे में आखिर क्या है? मेरे आसपास के दृश्य, लोग और घटनाएँ।
जब मैं पूरी तरह से उपस्थित होऊँगा, तभी तो आसपास की चीज़ों के बारे में लिख पाऊँगा। लगता है कि कुछ लिखते हुए अपने अस्तित्व को मायने मिल जाते हैं। अपने होने की यह अनुभूति बहुत प्रिय और सुकूनदेह है।
आखिर लिखे हुए शब्द कितना काग़ज़ लेते हैं? बोली हुई भाषा भला कितनी हवा को कंपित करती है?
पूरे दिन की दिनचर्या में लिखावट भला कितना समय लेती है? किन्तु मैं यह जो भी न्यूनतम प्रयोग करता हूँ, इसका कोई स्थानापन्न नहीं है। मैं जो भी कर रहा हूँ, वह दूसरों की नज़र में चाहे जितना छोटा और अपर्याप्त हो,
किन्तु मेरे हिस्से का काम है। चींटियाँ एक-एक कर कण ढोती हैं। मधुमक्खी एक-एक बूँद शहद इकट्ठा करती है। अपने हिस्से का काम करते रहने की ज़िद हमें असहायता के बोध से मुक्त करती है।
कभी किसी किताब के कवर पेज पर हाथ फेरना। किताब समुद्र की तरह शांत नज़र आएगी। किन्तु पन्ने-दर-पन्ने पलटते हुए उसके भीतर कितना कुछ उफनता हुआ मिलेगा। एक ऐसी गहराई, जो अपार है, अनंत है।
एक ऐसी दुनिया जिसमें शैवाल, सीपी, मछली और न जाने क्या-क्या दिखेंगे। बार-बार इस लघुता का एहसास होगा कि कितना कम जाना, देखा, और कितने कम तरीकों से सोचा। किसी किताब को पढ़ते हुए हम एक पूरा जीवन पढ़ते हैं। और किसी जीवन को पढ़ते हुए हम अपने जीवन को भी उसी गहराई से टटोलते हैं।
इस एकाकीपन में ख्याल आता है—मैं कुछ दिनों में भारत में होऊँगा। मेरे भीतर एक परखनली है, जिसमें वहाँ का शोर यहाँ के एकांत में घुल जाता है। यहाँ सब कुछ एक तरीके से है, वहाँ सब कुछ बेतरतीब होगा।
इन्हीं भिन्न-भिन्न अनुभवों में ही तो जीवन का रस है। जीवन के इन्हीं अनुभवों को पूरी शिद्दत से जीकर लिखने का मन करता है। कुछ लिखते हुए लगता है जैसे मैं एक छेनी चला रहा हूँ— अपने चरित्र को गढ़ रहा हूँ।
यूँ ही लिखते-पढ़ते रहिए, अपने हिस्से की छेनी चलते हुए, धीरे-धीरे ही सही, अपने चरित्र को गढ़ते रहिए।
विदा,
वीकेंड वाली कविता

