कुछ कविताएं जीवन को समझाने का प्रयास करती हैं और कुछ उसे थोड़ी देर ठहरकर देखने का अवसर देती हैं। कस्तूरी ऐसी ही 52 कविताओं का संग्रह है, जिनमें गांव की स्मृतियों से लेकर शहर की भागदौड़, रिश्तों की गर्माहट, अकेलेपन, प्रेम, प्रकृति, परिवार और बदलते जीवन की कई छवियां दिखाई देती हैं।
विनोद दूबे ने इन कविताओं में अपने आसपास की साधारण लगने वाली चीजों को विषय बनाया है। कहीं मां के आने से लौटता बचपन है, कहीं गांव की छूटती हुई पहचान है। कहीं नौकरी, प्रतिष्ठा और आगे निकलने की दौड़ के बीच पीछे छूट गए सपनों की याद है तो कहीं कॉर्पोरेट जीवन की चमक के पीछे छिपी संवेदनाएं हैं।
इन कविताओं की खासियत यह है कि वे बड़े प्रश्नों को रोजमर्रा के अनुभवों के माध्यम से सामने लाती हैं। भाषा सहज है और अनुभव निजी होते हुए भी पाठक को अपने जीवन से जुड़े लग सकते हैं। कस्तूरी भीतर छिपे उस सुकून की तलाश है, जिसे मनुष्य अक्सर बाहर खोजता रहता है।
कस्तूरी की कुछ कविताएं

  1. पूर्ण एकांत
    पूर्ण एकांत के बस कुछेक क्षण
    बाकियों से कितने भिन्न होते हैं,
    जीवन के वास्तविक अनुभव के,
    बस यही तो स्मृति-चिह्न होते हैं,
    शहर की भीड़ से दूर सुनसान,
    कॉफी की वो छोटी सी दुकान,
    एक मग में गर्म कॉफी और एक,
    प्लेट में ढेर सारा वक्त दरम्यान,
    उस कॉफी हाउस का वो कोना,
    जहां मैंने लिखी थी एक कविता,
    मैं, कॉफी, कागज, कलम एक थे,
    चंद मिनटों वह पूरा घंटा था बीता,
    न जाने कितने वायदे करके,
    मैं इस जीवन में तोड़ आया,
    उस अजनबी कॉफी हाउस में भी,
    फिर कभी नहीं लौट पाया।
    रुकी हुई ट्रेन की खिड़की से,
    मुलझुलाती रोशनी में दिखा,
    नाम भी ठीक से न पढ़ पाया,
    मलयालम में था जो लिखा,
    स्टेशन मास्टर की लालटेन सी,
    केरल का वह गुमसुम स्टेशन,
    लेटा हुआ कुत्ता, ऊंघते से पेड़,
    बस इतना सा अलसाया जीवन,
    ट्रेन तकरीबन पौने घंटे रुकी रही,
    उतरने का मन में खयाल आया,
    किन्तु सफर में रहने की आदतन,
    उस स्टेशन पर नहीं उतर पाया,
    परीक्षा केंद्र को जाता वो रिक्शा,
    संयोगन लड़की के साथ मैं बैठा,
    शर्मीली चुप्पी में भी बतियाते रहे,
    मेरा जीन्स और उसका दुपट्टा,
    उस सड़क पर फूल बिछ गये,
    हवाओं ने भी प्रेम के गीत गाये,
    मन को प्रेम हुआ किंतु मुंह से,
    उसका नाम तलक न पूछ पाये,
    मैंने जीवन में कई रिश्ते बनाये,
    हर रिश्ते में ढूंढा उसका साया,
    पर उस दिन जो लड़की मिली,
    उससे फिर कभी न मिल पाया,
    जब तपता है शरीर बुखार से,
    बिस्तर पर पड़े-पड़े बेजार से,
    एक-एक कर याद आते हैं सब,
    वो कॉफी हाउस, केरल का स्टेशन,
    वो सुनहरे दुपट्टेवाली लड़की,
    एकाकी स्मृतियों से बना यह जीवन।
  2. नास्टैल्जिया
    जब मैंने उससे प्रेम किया था,
    सोचा था कभी भूल न पाऊंगा,
    उसने भी कहा ऐसा दिन नहीं,
    जब मैं उसको याद न आऊंगा,
    फिर मैं लगा रहा घर के,
    मकड़ी के जाले साफ करने में,
    नलके ठीक करने और,
    घर के बल्ब बदलने में,
    इन गैर जरूरी कामों ने
    इस कदर उलझा दिया,
    कि जो सबसे जरूरी था,
    मैंने उसको ही भुला दिया,
    अलग करने की चाह थी,
    जब से होश संभाला था,
    ये सपना मन के घोंसले में,
    गौरैया की तरह पाला था,
    किन्तु उलझा रहा मैं नौकरी,
    प्रतिष्ठा, गाड़ी और घर में,
    इनकम टैक्स और इन्वेस्टमेंट,
    कभी प्रमोशन के चक्कर में,
    लोगों की देखादेखी मुझे भी,
    लगी रही आगे रहने की होड़,
    न जाने कब अपने सपने मैंने,
    सिर्फ नींद के भरोसे दिए छोड़,
    न उसे हासिल कर पाया,
    न सपनों का कुछ किया,
    अब कुछ पास है तो बस,
    उन यादों का नास्टैल्जिया,
    न उसका, न उन सपनों का,
    अब मुझमें जुनून बाकी है,
    इस नास्टैल्जिया के सहारे,
    बस थोड़ा सा सुकून बाकी है,
    ये सुकून भी क्षणभंगुर है,
    झट से दूर चले जाना है,
    इन रोजमर्रा के कामों में,
    हम सबको खो जाना है,
    कभी बाजार से जाकर,
    दूध और ब्रेड लाना होगा,
    कभी नजर कमजोर होगी,
    चश्मेवाले को दिखाना होगा।
  3. माँ का आना
    माँ बड़े दिनों बाद मेरे पास जब,
    चंद रोज के लिए रहने को आती है,
    अपने सूटकेस में बच्चों के खिलौने,
    और मेरे लिये मेरा बचपन लाती है,
    मेरे जीवन के साहूकार की तरह,
    माँ दुहराती रहती है सारे हिसाब,
    जिन्हें वक्त की दराज में छोड़ आया,
    वो झाड़-पोंछ लाती है सारे किताब,
    वो याद दिलाती है मेरा बचपन,
    मेरे कारनामे और मेरी करतूतें,
    सुनकर मैं झेंपता हूं, मुस्कराता हूं,
    जैसे एक जनम हुआ हो बीते,
    बच्चों की हरेक फरमाइश पर,
    रसोई में जाने क्या-क्या पकाती है,
    बच्चों को खुद से खाना सीखना था,
    माँ उन्हें अपने हाथ से खिलाती है,
    बच्चों को देखती और चूमती है,
    दुलार न्यौछावर करना चाहती है,
    अनुपस्थिति में छूटे हुए प्रेम का,
    हिसाब बराबर करना चाहती है,
    बहू की व्यस्तताओं का,
    हमेशा जिक्र करती है,
    उसके स्वास्थ्य की उससे भी,
    ज्यादा फिक्र करती है,
    बहू से सीखती और सिखाती है,
    उसे परिवार की धुरी बताती है,
    घर-गृहस्थी, परिवार-रिश्तेदार,
    उसको अलग सिलेबस पढ़ाती है,
    वो हमारे चेहरों पर सदा एक,
    मुस्कराहट देखना चाहती है,
    हमारे दुखों की छन्नी बनकर,
    हमसे पहले उन्हें रोकना चाहती है,
    उसके चले जाने के बाद भी,
    उसके शब्द कानों में गूंजते हैं,
    “माँ चली गई क्या?”
    कई दिनों तक पड़ोसी पूछते हैं।
  4. कहाँ से हो?
    शहरों की रोशनी ने ले ली है,
    पास के सारे गांवों की बिजली,
    शहरों की बाढ़ में डूब गये हैं,
    इन गांवों की अपनी पहचान,
    जब कोई पूछता है कि, कहाँ से हो?
    मैं बड़े विस्तार से बताना चाहता हूं,
    परसीपुर से आठ किलोमीटर दक्खिन,
    बरवां गांव है मेरा,
    कोई ऑटो या तांगा भले मिल जाए,
    किंतु लठिया पुल से तीन किलोमीटर
    पैदल ही जाना होगा,
    एक बूढ़े पीपल के पास का खड़ंजा रास्ता,
    मेरे घर की ओर ताकता होगा,
    पर मेरे सकुचाए गांव को
    उघाड़ने की मुझमें हिम्मत नहीं,
    और मुझे इतने करीब से जानने की
    तुम्हारे पास इतनी फुरसत नहीं,
    इसलिए मैं अपने गांव की सारी मिठास
    शहर के चमचमाते रैपर में पेश करता हूं,
    “मैं बनारस से हूं”
    सिर्फ यही कहता हूं,
    मेरे इतना कहने भर से
    तुम्हें गंगा से लेकर मोदी तक
    हर चीज की फिक्र है,
    किंतु इन बातों में कहां
    मेरे गांव का जिक्र है,
    इस तरह के अनेक गांवों से बने,
    मेरे देश की अजीब विडंबना है,
    पगड़ी बांधे भटिंडा के पाजी
    खुद को दिल्ली का कहते हैं,
    सफेद चप्पल पहने आसनसोल के बड़े बाबू
    खुद को कलकत्ते का समझते हैं,
    हर कोई खुद को किसी न किसी
    शहर का कह रहा है,
    जबकि उसके भीतर पहचान छुपाए
    उसका छोटा सा गांव रह रहा है।
  5. कॉर्पोरेट तहजीब
    पूरे बांह और बंद गले की शर्ट,
    तिसपर कसी चमकीली टाई,
    क्रीजदार पैंट जोड़कर किसी ने,
    कॉर्पोरेट पोशाक है बनाई,
    चेहरे पर बनावटी मुस्कान,
    गले में पहचान पत्र का फंदा,
    तरक्की के ये सबूत मिटा दें,
    पीछे का सारा गोरखधंधा,
    टीक की मेज वाला बोर्ड रूम,
    उसमें लेमन ग्रास की गंध,
    धमनियों में बर्फ जम जाए,
    यूँ सिहरन भरी एसी की ठंड,
    इसी ठंडे खून जैसी संवेदनाओं से,
    वो बेखटके हौसला कर पाते हैं,
    कितनों को नौकरी से निकालना है,
    चुटकी में यह फैसला कर पाते हैं,
    मर्जर और एक्विजिशन,
    नफा नुकसान और जीत हार,
    पीपीटी का चश्मा लगाकर सभी को,
    दिखा लेते हैं एक आभासी संसार,
    पर कुछ लोगों का कोमल सा दिल,
    बेवजह के एग्रेशन से कांपता है,
    जीत हार का उसे फर्क नहीं पड़ता,
    वो बेचारा सिर्फ खेलना चाहता है,
    कॉर्पोरेट दुनिया की तहजीब,
    उन्हें ठीक से समझ नहीं आती है,
    सीरियस मीटिंग्स में भी कलम,
    उनकी डायरी में डूडल बनाती है,
    दे दो बाकियों को ब्लैक एंड व्हाइट,
    उन्हें सिर्फ ग्रे के हवाले कर दो,
    इन मिसफिट लोगों के अप्रेजल में,
    प्रमोशन की बजाय थोड़ा सुकून भर दो।

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