
समुद्र में बिताए वर्षों के अनुभव जब शब्दों का रूप लेते हैं तो जीवन को देखने का एक अलग नजरिया सामने आता है। विनोद दूबे का कविता संग्रह जहाजी ऐसे ही अनुभवों, स्मृतियों और विचारों का संग्रह है। यह वीकेंड वाली 52 कविता शृंखला का 2023 का संग्रह है। इसमें 52 कविताओं के माध्यम से जीवन के अलग अलग रंग सामने आते हैं।
इस संग्रह में जहाजी जीवन और समुद्र एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि के रूप में मौजूद हैं। साथ ही अतीत, सपने, इंसानियत, रिश्ते, अकेलापन, प्रतिस्पर्धा, असफल संघर्ष और बदलती जीवनशैली जैसे विषय भी कविताओं में आते हैं। संग्रह की शुरुआत ही अस्तित्व, जीवन के उद्देश्य और मनुष्य की अपनी तलाश जैसे प्रश्नों से होती है।
कवि ने अपने अनुभवों को किसी एक विषय तक सीमित नहीं रखा है। कहीं बचपन की स्मृतियां वर्तमान में लौट आती हैं तो कहीं नौकरी और सफलता की दौड़ के बीच मनुष्य अपने मूल सपनों को तलाशता है। समुद्र के अनुभवों में जीवन के ठहराव, समय और मनुष्य के स्वभाव को समझने की कोशिश दिखाई देती है। स्वयं लेखक के अनुसार ये कविताएं जीवन से मिले अनुभवों और संवादों से निकली हैं और उनकी भाषा आम बोलचाल के करीब रखने का प्रयास किया गया है।
जहाजी की कुछ कविताएं
- अतीत
इंसान अपने वर्तमान के सीने पर,
अतीत की गठरी लिए चलता है।
किसी पहाड़ी रिसोर्ट में लेटे,
मूसलाधार बारिश की बिजली,
जब भोर में जगा देती है,
वो खिड़की से पहाड़ को,
महसूस कर रहा होता है,
तभी अचानक उसे याद आता है वो लड़का,
जो कॉलेज से घर लौटते,
ऐसी ही किसी बारिश वाली कीचड़ में,
चप्पल की निकली बत्ती ठीक कर रहा है,
उसका मन इस पहाड़ से आंखें फेरकर,
चल पड़ता है उस लड़के की मदद करने को।
किसी मेहमाननवाज रेस्टोरेंट में
पनीर लबाबदार और लच्छा पराठा खाते,
उसे याद आ जाता है वो लड़का,
जो 2 रुपए का पारले जी खाते समय भी,
जेब में बचे खुचे सिक्कों की तहकीकात कर रहा है,
वो रख देता है उठाया कौर फिर से थाली में,
और टिप के पैसे जेब में अलग करने लगता है।
किसी टीक मेज पर ग्रीन टी के प्याले के साथ,
लैपटॉप पर काम करते,
उसे याद आता है वो लड़का,
जो किसी सरकारी स्कूल की टाट पर बैठा,
त्रिकोणमिति और एल्जेब्रा के साथ,
उमस के पसीने से भी जूझ रहा है,
कीबोर्ड पर चलती अंगुलियां थमकर,
बढ़ जाती हैं उस लड़के का पसीना पोंछने।
ये इंसान के बस का नहीं,
कि अतीत की गठरी गुमनाम सड़क पर छोड़कर,
अकेले स्वच्छंद चल पड़े।
इसीलिए अतीत की यादें सीने में छुपाए,
इंसान वर्तमान में ठीक वैसे ही मुस्कुराता है,
जैसे मखमली कालीन,
मेहमानों को देखकर मुस्कुराती है,
अपने नीचे पूरे घर का कचरा छुपाए,
या फिर वार्डरोब का पल्ला बाहर से
मुस्कुराता है,
अपने भीतर ठूंसे कपड़ों को कसकर दबाए।
- इंसानियत
काश! इंसानियत की भी कोई रिपोर्ट कार्ड होती।
गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल,
इन विषयों में मिलते हैं अंक,
बच्चों संग पेरेंट्स भी बजाते हैं ढोल,
पर क्यों नहीं होती कोई परीक्षा,
ना मिलती है कोई ग्रेडिंग इस बात पर,
कौन असफल होकर भी कोशिश करता है,
कौन सफल होकर भी विनम्र रहता है,
कौन दूसरों की मदद करता है,
कौन खेल को हार जीत से ऊपर समझता है।
स्कूलों और कॉलेजों से,
उनके बनाए विषयों में ग्रेड पाकर,
रेट रेस में दौड़ने को खड़े हो जाते हैं,
कहने को हम बड़े हो जाते हैं।
पर हम आदतन बेजरूरत ग्रेडिंग जारी रखते हैं,
कौन कितना कमाता है,
कौन महंगे मॉडल की गाड़ी चलाता है,
किसका पॉश लोकेशन में घर है,
किसके रुआब से ऑफिस में कईयों को डर है।
हम अब भी नहीं तवज्जो देते कि,
कौन औरों के दुख दर्द सचमुच बांटता है,
कौन निस्वार्थ किसी की बात सुनना चाहता है,
कौन बूढ़ों को देखकर बेवजह मुस्कुराता है,
कौन व्यस्तता में भी जरूरतमंद को सड़क पार करा देता है।
इंसानों की ये दुनिया इंसानों के लिए है,
लोगों को मैटेरियल के आधार पर मत मोलिए।
स्कूल, कॉलेज ने नहीं सिखाया तो क्या हुआ?
आप तो उन्हें इंसानियत की तराजू पर तौलिये।
- कॉर्पोरेट पिंजरा
हमें कुछ और करना था,
कुछ और ही कर रहे हैं हम,
जितना जी रहे हैं रोज,
उससे ज्यादा मर रहे हैं हम।
कॉलेज में जिसे दुनिया बदलनी थी,
वो सालों एक ही नौकरी से लिपटा है,
जिसे खेल के मैदान में होना था,
वो ऑफिस के क्यूबिकल में सिमटा है।
जिसे कहानियां, कविताएं लिखनी थीं,
वो किसी बैंक के लिए कोड लिख रहा है,
जिसे अपना स्टार्टअप खड़ा करना था,
वो 9 से 5 की चक्की में पिस रहा है।
नई नौकरी, नए पैसे, नया ओहदा,
सब कुछ कितना ऑसम था,
शुरुआत में जो पाला था,
वो हनीमून सा वहम था।
कहां पता था इस सोने के पिंजरे से,
कभी हम उड़ नहीं पाएंगे,
इंजन चलेगी जिधर तेल की,
बेमन पहिये से हम भी चलते जाएंगे।
हमारी पहचान, हमारे सपने,
इन बातों की कहां किसे है फिक्र,
हम टूटे तो नए पहिये लग जाएंगे,
तेल की रफ्तार में कहां हमारा जिक्र।
फ्राइडे शाम दोस्तों के साथ,
जो दुनिया भर की बात करते हैं,
शराब तो बस बहाना है,
वो हफ्ते भर के घाव भरते हैं।
अब तो ना सही को सही,
ना गलत को गलत कहते हैं,
“अपन को क्या फर्क पड़ता?”
अब इसी गफलत में रहते हैं।
ख्वाहिशों के पंख झड़ जाएंगे,
आत्मसम्मान की रीढ़ गल जाएगी,
इसी पिंजरे को जिंदगी मान बैठे,
तो इसी में शाम ढल जाएगी।
यहां से निकलने का रास्ता,
माना इतना सरल नहीं है,
नेटफ्लिक्स पर वक्त गुजारना,
ये भी तो कोई हल नहीं है।
एक बार फिर से पंख फड़फड़ाते हैं,
पिंजरे की कुंडी तोड़ते हैं,
दस साल बाद जहां होना है,
उस आसमान से नाता जोड़ते हैं।
दिल्ली की तरफ कूच तो करें,
जहां पहुंचे वो शायद रंगून होगा,
पर रास्ता और रफ्तार हमने चुना था,
इस बात का सुकून होगा,
हर शाम थककर चूर हो जाएंगे,
लेकिन सुबह पैरों में नया जुनून होगा।
- समंदर… मेरी पाठशाला
मैं जहाजी हूं,
समंदर मेरी पाठशाला है।
मैं रोज सूरज को समंदर से,
निकलते और उसी में ढलते देखता हूं।
Amplitude और Merpass के
सारे कैलकुलेशन के बाद,
मुझे समझ आता है कि,
मिट्टी का बना इंसान,
सारी ऊंचाइयां चढ़ने के बाद,
उसी मिट्टी में मिल जाता है।
मैं समंदर के कई चेहरे देखता हूं,
कभी कोसों पसरी नीली खामोशी,
तो कभी अहंकारी उफान।
मौसम और चक्रवात की
सारी गुणा गणित के बाद,
मुझे समझ आता है कि,
वक्त का काम है गुजर जाना,
बस हमें ठहरना होता है।
मैं अनगिनत अनजान लोगों से मिलता हूं,
कुछेक से जीवन भर का नेह लगाता हूं,
कुछेक को बिल्कुल ना झेल पाता हूं,
“गैंगवे की दोस्ती गैंगवे तक” का पाठ पढ़ने के बाद,
मुझे समझ आता है कि,
तरह तरह के लोगों से मिलने की,
इंसानी नियति है जो नहीं बदलती,
बस हमें बदलना होता है।
मैं जहाजी हूं,
मेरे अनुभवों के किस्से में,
इंसानों से ज्यादा,
समंदर लिखा है,
समंदर मेरी पाठशाला है।
जो कुछ सीखा है,
मैंने इसी से सीखा है।
- असफल संघर्ष
मिलकर संघर्ष के तमाम छोटे बड़े हिस्से,
बमुश्किल बना पाते हैं सफलता के एकाध किस्से,
तो माना कि सफलता का गुणगान होना चाहिए,
पर असफल संघर्ष का भी तो
जरा सा सम्मान होना चाहिए।
प्रसव के बाद लाखों महिलाएं,
बढ़ी जिम्मेदारी का आभास करती हैं,
शरीर और मन को फिर से पटरी पर,
लाने के लिए घंटों प्रयास करती हैं।
जबकि वो जानती हैं कि जरूरी तो नहीं,
हर मेहनत का मुकम्मल अंजाम हो जाए,
प्रसव के बाद हर लड़की मैरीकॉम हो पाए।
गांव देहात से निकले कई लड़के,
खाली जेबों में ढेरों ख्वाब लाते हैं,
सीने में कुछ हासिल करने की चाह,
और बाजुओं में मेहनत बेहिसाब लाते हैं,
जबकि वो जानते हैं कि जरूरी तो नहीं,
हर संघर्ष पर एक दिन कहानी बन पाए,
हर लड़का धीरूभाई अंबानी बन जाए।
कभी आस पास नजरें घुमाकर देखिए तो सही,
दिनभर की नौकरी से थककर लौटे पिता,
शाम की शिफ्ट के लिए तैयार हो रहे हैं,
पूरे परिवार के पेट भर सपनों के खातिर,
मां के अपने सपने रसोई में बेजार हो रहे हैं।
पड़ोस की छत पर देर रात तलक,
कोई टेबल लैंप जलाए पढ़ रहा होगा।
स्टार्टअप की चाह में ऑफिस के बाद,
कोई लैपटॉप पर घंटों खिटपिट कर रहा होगा।
जबकि ये सब जानते हैं, जरूरी तो नहीं,
हर पसीने का नमक,
सफलता के स्वाद में बदल जाए।
हर खामोश संघर्ष,
एक दिन विजय नाद में बदल जाए।
इन संघर्ष के किस्सों पर कल फिल्म बने ना बने,
इनकी पीठ पर आज शाबाशी की निशानी दीजिए,
ये नवांकुर कल को वृक्ष बनें या मुरझा जाएं,
पर आज इन्हें पनपने को थोड़ा सा पानी दीजिए।
