
कुछ कविताएं किसी एक विषय के आसपास नहीं ठहरतीं। वे जीवन के अलग-अलग अनुभवों से गुजरते हुए अपना रास्ता बनाती हैं। विनोद दूबे का काव्य संग्रह बेतरतीब ऐसी ही 52 कविताओं का संग्रह है। यह 2024 में प्रकाशित हुआ और लेखक की वीकेंड वाली कविता शृंखला का तीसरा काव्य संग्रह है।
इस संग्रह में निजी पीड़ा से लेकर परिवार, बचपन, बढ़ती उम्र, रिश्तों, प्रेम, अकेलेपन, जीवन की दौड़ और मनुष्य के भीतर चलने वाले द्वंद्व तक कई विषय दिखाई देते हैं। दीदी में भाई बहन के रिश्ते की स्मृतियां हैं तो निजी दर्द में उन संघर्षों की बात है जिन्हें मनुष्य अक्सर दूसरों से छिपाकर जीता है। जीवन का ग्राफ जीवन के अलग-अलग पड़ावों को देखने की कोशिश करती है। वहीं लेट गो और स्लो डाउन वर्तमान जीवन की आपाधापी के बीच ठहरने और कुछ चीजों को सहजता से छोड़ देने की ओर संकेत करती हैं। इन कविताओं की विषयवस्तु के बारे में पुस्तक की अनुक्रमणिका भी इसकी व्यापकता दिखाती है।
कवि ने भूमिका में स्पष्ट किया है कि संग्रह की कविताएं जानबूझकर किसी एक विषय या क्रम में नहीं रखी गई हैं। जिस तरह जीवन अपने आप में बेतरतीब है, उसी तरह इसकी कविताएं भी अलग-अलग अनुभवों से निकलती हैं। भाषा को आम बोलचाल के करीब रखने का प्रयास किया गया है।
विनोद दूबे ने इन कविताओं में अपने आसपास की साधारण लगने वाली चीजों को विषय बनाया है। कहीं मां के आने से लौटता बचपन है, कहीं गांव की छूटती हुई पहचान है। कहीं नौकरी, प्रतिष्ठा और आगे निकलने की दौड़ के बीच पीछे छूट गए सपनों की याद है तो कहीं कॉर्पोरेट जीवन की चमक के पीछे छिपी संवेदनाएं हैं।
इन कविताओं की खासियत यह है कि वे बड़े प्रश्नों को रोजमर्रा के अनुभवों के माध्यम से सामने लाती हैं। भाषा सहज है और अनुभव निजी होते हुए भी पाठक को अपने जीवन से जुड़े लग सकते हैं। कस्तूरी भीतर छिपे उस सुकून की तलाश है, जिसे मनुष्य अक्सर बाहर खोजता रहता है।
बेतरतीब की कुछ कविताएं
- निजी दर्द
ऐसी कई लड़ाइयां होती हैं,
जो अकेले लड़ता है इंसान,
भीतर से टूटा, उदास, खाली,
बाहर हंसता रहता है इंसान…
हालात, लोग या घटनाएं,
हर कहानी में एक विलेन है,
हम सबके सीने पर,
किसी पत्थर का भारी वजन है…
अपने कई निजी दर्द,
वो जमाने से छुपाये रहता है,
“सब ठीक है” कहकर खुद को,
कई सवालों से बचाये रहता है…
पर कई दफा थककर, चाहता है,
कि सारी जिद छोड़ दे और हार जाए,
रोने के लिए अब एकांत न ढूंढे,
मुस्कराते चेहरे का नकाब उतार पाए…
दर्द उड़ेल दे सबके सामने,
कह दे कि वो कितना उदास है,
भीतर सब खोखला है,
ये झूठी मुस्कान तो बकवास है…
लेकिन तभी उमड़ आती है,
उसके आत्मसम्मान की लहर,
क्या हारने के लिए शुरू किया था,
मैंने ये तन्हा अकेला सफर…
और फिर एकांत में रोकर वो,
आंसुओं को ताकत में गढ़ता है,
चेहरे पर मुस्कान का लेप लगाकर,
सफर में फिर से चल पड़ता है,
ऐसे न जाने कई होंगे,
आपके साथ इस सफर में,
आप हंस न दें कहीं उनपर,
कुछ नहीं कहते हैं इसी डर में…
- दीदी
तुम मुझसे पहले इस दुनिया में आयी,
ताकि ये दुनिया मेरे रहने लायक बना सको,
“आ जाओ, मत डरो, मैं हूं”
तुम्हारे इसी कहे, तुम्हारे पीठ पीछे,
मैं चला आया।
एक ही मां के जाये,
हम दोनों बचपन से कितने अलग थे,
जब मैं स्लेट पर गुणा भाग सीख रहा था,
तुम एक खूबसूरत-सा चित्र बना रही थी,
जब मैं कक्षा में प्रथम आने की होड़ में था,
तुम साग खोट रही थी, कजरी गा रही थी।
इन भिन्नताओं के बावजूद हम दोनों,
हमेशा पूरक थे एक दूसरे के,
तुम्हारे गीत गवनही मेरे लिए धूप में छाया थी,
और मेरा बेहतर करना, मुझसे ज्यादा तुम्हारे लिए गर्व।
कभी-कभी लगता है,
मैं खुद से ज्यादा तुम्हारे लिए पढ़ता रहा,
क्योंकि तुम्हें उम्मीद थी,
मैं बड़ा आदमी बनकर हमारी तकदीर बदल दूंगा,
इसी दौड़ में हम दोनों अलग हो गए,
तुम्हारी विदाई से ज्यादा तीखा दर्द,
मेरी स्मृतियों में आज भी कहीं नहीं है।
तुमसे दूर होने ने मुझे जितना असहाय किया,
उतना ही रूखा भी बनाया,
वो पहला फोन नंबर जो मुझे मुंह-जुबानी याद था,
वह तुम्हारा था क्योंकि वही मेरी लाइफ लाइन थी।
मुझसे दूर अपनी गृहस्थी में उलझी तुमने,
मुझे कभी अकेले नहीं छोड़ा,
मेरी सारी उलझनें सुलझाती रहीं,
विवाह के वक्त सिंदूर भरते मैंने,
जिम्मेदारी से डरकर तुम्हारी तरफ देखा था,
“डरो मत, मैं हूं” तुम्हारी बोलती आंखों ने,
मुझे तब भी संबल दिया था।
मुझे जो कुछ हासिल हुआ वो सिर्फ तुमसे साझा किया,
लगा मेरा सारा हासिल तुम्हारा ही तो है,
अनुभव के चकत्तों ने मेरा चेहरा भी रूखा कर दिया है,
अब बचपन सिर्फ तभी मुझमें लौटता है,
जब मैं तुम्हारे पास होता हूं,
अपने-अपने जीवन की बैलगाड़ी हांकते,
हम दोनों कितने दूर हो गए, दीदी!
तुम मुझे बड़ा आदमी तो बनाना चाहती थी,
पर उसकी कीमत नहीं जानती थी,
तुमसे दूर इस दुनियाबी लड़ाई में,
मुझे बहुत अकेलापन लगता है,
बस हर साल जब तुम्हारी राखी मिलती है,
तो फिर से तुम्हारे पास होने का एहसास होता है।
ईश्वर तुम्हें इतनी शक्ति और सामर्थ्य दें,
आजीवन मेरे कानों में तुम्हारी आवाज गूंजती रहे कि
“डरो मत, मैं हूं!”
और मुझे जीवन भर लगता रहे,
भला मुझे क्यों डरना,
जब तुम मेरे साथ हो।
- जीवन का ग्राफ
शून्य से शुरुआत थी,
बचपन की क्या ही बात थी,
भूरी मिट्टी में अलसाती,
किसी तितली की धड़कन,
न कोई चिंता ना दंभ,
कोरे स्लेट-सा निर्मल मन,
चट्टानों के बीच उगे घास-सी,
तमाम उत्सुकताएं,
हर परिणाम से लापरवाह,
क्षितिज तक फैली आकांक्षाएं,
फिर वक्त की दहलीज के पीछे,
कहीं बचपन छूट गया,
बचपन का नन्हे बादल-सा टुकड़ा,
नीले आकाश से टूट गया…
जवानी की बसंती हवा,
इच्छाओं की पीली धूप उड़ाती रही,
रबड़ के छल्ले-सी खिंचती चाहतें,
दंभ और दर्प के ढूह बनाती रही,
कभी लगा कि अपनी नियति पर
सिर्फ अपना कंट्रोल है,
अपनी कहानी में अपने पास
किसी सुपरस्टार का रोल है,
लेकिन हर ग्राफ को एक ऊंचाई से
फिसलना होता है,
शरीर, दौलत, शोहरत के ढूहों को,
मिट्टी-सा दरकना होता है,
बढ़ती उम्र की सूखे पत्तों-सी बोझिल गंध,
सब कुछ खोते जाने की अपरिचित तन्हाई,
आंसुओं के पीछे का धुंधलापन,
और फिर मौन की अथाह गहराई,
सूनी दोपहर की सांय-सांय करती हवा लिए,
मृत्यु सारे टूटते ढूह बुहार देती है,
जिस शून्य पर सवार होकर ग्राफ शीर्ष तक पहुंचा था,
मृत्यु उसे उसी शून्य पर उतार देती है…
संताप, पश्चाताप,
दंभ और गर्व है,
जीवन का ग्राफ कोई सरल रेखा नहीं,
इसके अपने ही वक्र हैं।
- LET GO
छोड़ देना सबके बस का नहीं,
हम देर तलक ढोते रहते हैं,
छूटते को जबरन पकड़ने में,
जो पास है उसे भी खोते रहते हैं।
जरूरी नहीं कि हर किसी से,
आपके आचार और विचार मिलें,
बावजूद लाख कोशिशों के,
रह जाएंगे कुछ रिश्तों में शिकवे गिले।
क्यूं आंख दिखाना उन रिश्तों को,
उनसे चुपचाप मुंह मोड़ लेना,
न बहस ना तू-तू ना मैं-मैं,
कुछ रिश्तों को सादर छोड़ देना।
कुछ चीजें कभी नहीं मिलेगी,
कुछ ख्वाहिशें पूरी हो न पाएंगी,
बावजूद मेहनत, लगन, अनुशासन,
कुछ इच्छाएं अधूरी रह ही जाएंगी।
नियति से भला कौन जीता है,
जिद की दरकती दीवार तोड़ देना,
मन में कोई ग्लानि मत रखना,
कुछ आकांक्षाएं सादर छोड़ देना।
कई रिश्ते मुकम्मल नहीं होते,
कई ख्वाहिशें पूरी नहीं होती,
इन चीजों के बिना भी,
ये जिंदगी अधूरी नहीं होती।
तो जो कुछ मिला उसका,
तहेदिल से सम्मान करो,
जो नहीं मिला उसे जाने दो,
दूर से सादर प्रणाम करो…!
- SLOW DOWN
ख्यालों में सिर्फ मंजिल है,
रास्ते पर है नजर कहां?
कल की आस में यूं बेसुध हो,
इस पल की कुछ खबर कहां?
थोड़ा वक्त दो, सम्मान दो,
इस जीवन के उपहार को,
कहां भागते फिरते हो,
धीमी कर लो रफ्तार को…
फोन, टीवी, सोशल मीडिया,
स्क्रीन पर तुम गड़े हुए हो,
सबसे बेहतर बन जाने को,
बस खुद में डूबे पड़े हुए हो।
बाहर निकलो और निहारो,
इस प्रकृति के विस्तार को,
कहां भागते फिरते हो,
धीमी कर लो रफ्तार को…
सालों-साल हैं पास तुम्हारे,
पर मिनटों की तंगहाली है,
दिन कामों से भरा पड़ा है,
पर भीतर सब कुछ खाली है!
बेवजह भी कुछ वक्त गुजारो,
हटाकर प्लानिंग के इस भार को,
कहां भागते फिरते हो,
धीमी कर लो रफ्तार को…
सुविधाओं संग दुःख मिले,
ये कैसा विपरीत विकास है,
चीजें भर ली, मन खाली है,
ये तो नियति का उपहास है।
गिनकर मिली हैं सांसें सबको,
आहिस्ता चुकाओ इस उधार को,
कहां भागते फिरते हो,
धीमी कर लो रफ्तार को…!
