
कुछ कविताएं किसी एक विषय तक सीमित नहीं रहतीं। वे जीवन के अलग-अलग अनुभवों, स्मृतियों और भावनाओं से होकर गुजरती हैं। विनोद दूबे का काव्य संग्रह गुल्लक ऐसी ही 52 कविताओं का संग्रह है। इसमें वर्ष 2024 के 52 सप्ताहों में लिखी गई 52 कविताओं को शामिल किया गया है। यह वीकेंड वाली कविता शृंखला का चौथा काव्य संग्रह है। इससे पहले वीकेंड वाली कविता, जहाजी और बेतरतीब प्रकाशित हो चुके हैं।
इस संग्रह में बचपन की स्मृतियों से लेकर मां, प्रेम, रिश्ते, नौकरी, अकेलापन, जीवन संघर्ष, देश, समाज और मनुष्य के भीतर चलने वाले द्वंद्व तक कई विषय दिखाई देते हैं। सहेजना में बचपन और स्मृतियों को संभालकर रखने की इच्छा है तो क्षणभंगुर जीवन जीवन की अस्थिरता को सामने रखती है। ईश्वर हो जाना मनुष्य के भीतर छिपी संवेदना और दूसरों के लिए कुछ करने की भावना को सामने लाती है। वहीं मैं introvert हूं व्यक्ति के अपने स्वभाव और शांत जीवन की इच्छा को व्यक्त करती है। वीकेंड आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच मनुष्य के लिए थोड़े से अवकाश की तलाश है। पुस्तक की अनुक्रमणिका भी विषयों की इस विविधता को स्पष्ट करती है।
कवि ने भूमिका में बताया है कि मनुष्य का जीवन अनेक विरोधी भावों के बीच चलता रहता है। गांव और शहर, देश और विदेश, जीवन और मृत्यु, उत्सव और शोक, बसंत और पतझड़ तथा अपने और पराए जैसे अनुभव इसी जीवन का हिस्सा हैं। इन्हीं भावनाओं को कवि ने सप्ताह दर सप्ताह कविता के रूप में दर्ज किया है। उनकी कोशिश भाषा को सरल और आम बोलचाल के करीब रखने की रही है, ताकि कविताएं अलग-अलग तरह के पाठकों तक सहजता से पहुंच सकें।
गुल्लक की कुछ कविताएं
1. पहाड़ी बारिश
सपनों की फेहरिस्त में,
मेरा एक खास सपना है,
मुझे बारिशों के चंद रोज,
पहाड़ी रिसोर्ट पर रहना है,
अदरक की चाय लिए, खिड़की की ओट से,
बूंदों के सिक्के निकालूं, बादल की सफेद कोट से,
फूलों की लापरवाह क्यारी में, कहीं चंपा और कहीं गुलाब हो,
मेज पर डायरी और कलम हो, पास निर्मल की कोई किताब हो,
रात में रोशन पहाड़ी पर,
सिर्फ जुगनू ही पहरेदार हों,
रात भर भीगते और ऊंघते,
पेड़ों में चीड़ देवदार हों,
न फोन हो ना फोन की तस्वीरें,
सोशल मीडिया पर मुस्तैद हों,
बस आंखों से ली कुछ तस्वीरें,
जो आंखों के भीतर ही कैद हों,
पहाड़ों के विशाल सीने पर,
कोमल बारिश की फुहार हो,
ऊबड़ खाबड़ यादों से परे,
समतल विचारों का संसार हो,
प्रकृति मूक संवादों के पल में,
कुछ ऐसा मुझसे कह जाए,
मैं पहाड़ों से लौट चला आऊं,
पर पहाड़ी बारिश मुझमें रह जाए…
2. सहेजना
बचपन की मासूम अलमारी में,
क्या-क्या सहेज कर रख आए,
वक्त की धूल चीजें मिटा गईं,
हम देखने को भी नहीं जा पाए,
घर के पास फुलवारी में गाड़ आया था,
दूध के नए-नए टूटे हुए सफेद दांत,
गांव के खपरैल वाले घर की मुंडेर पर,
छुपा आया था चूं-चूं करते रंगीन जूते,
भूसे वाले कमरे में कहीं पकने को,
छोड़ आया था मैं कुछ कच्चे आम,
ननिहाल में रोशनदान पर पड़ा होगा,
माचिस की डिबिया वाला मेरा टेलीफोन,
स्कूल की क्लास के कोने वाले बेंच पर,
खुरचकर लिखा होगा आज भी मेरा नाम,
अलमारी की बेतरतीब किताबों में होगी,
गुलाब की पंखुड़ी और अधलिखी चिट्ठी,
बचपन का सहेजा बेफिजूल लगता है,
पर सहेजने की ऐसी लत लग गई,
चीजें बदलीं और तरीका बदला,
पर सहेजने की आदत नहीं गई,
अब भी सहेजता हूं मैं,
बैंक और जमीन के कागजात,
तमाम अकाउंट और उनके पासवर्ड,
ड्रॉपबॉक्स और क्लाउड के राज में,
प्यार, नफरत, स्नेह, जलन, आंसू,
दिल के किसी पोशीदा दराज में…
इंसान कितना भी सहेज कर रख ले,
अंत में सब रिक्त रह जाता है,
स्मृतियों के अलावा उसके पास,
आखिर में कुछ नहीं बच पाता है…
3. क्षणभंगुर जीवन
हल्के भूकंप से सिहर जाएगी,
वह तो रेत की नींव पर खड़ी है,
जिसे तुम महल समझे बैठे हो,
जिंदगी घास फूस की झोपड़ी है,
खुशी और गम के चंद लश्कारे,
जैसे फिजाओं की फुलझड़ियां हैं,
इन दोनों का निरंतर क्रम होगा,
ये ज्वार और भाटा की लड़ी है,
बेहतर होने की आस में,
गुजरती जा रही हर घड़ी है,
राम के आगमन के विश्वास में,
पत्थर बन अहिल्या पड़ी है,
वो किस्मत मिल ही जाएगी,
जो आपके नसीब में गड़ी है,
सजाओं से भी बच न पाओगे,
ईश्वर की अपनी अलग छड़ी है,
जिंदगी के सफर में कभी धूप,
तो कभी बारिश की झड़ी है,
आखिरी मील के पत्थर पर,
मौत की एक तख्ती जड़ी है…
4. ईश्वर हो जाना
हमारे किस्सों में भगवान,
जो काम किया करते हैं,
वही काम करने के मौके,
हमें तो रोज मिला करते हैं,
कभी जरा सी जेब,
ढीली किया करो,
बेवजह भी कभी कुछ,
खरीद लिया करो,
ट्रैफिक सिग्नल पर,
उस अनाथ बच्चे से किताबें,
गोद में बच्चा लिए,
उस उदास औरत से गुब्बारे,
दिवाली की शाम सड़क पर,
उस बुढ़िया से मिट्टी के दीये,
इतना ज्यादा पैसा भी,
तुम्हें नहीं लगाना होगा,
बस एकाध बार,
रेस्टोरेंट नहीं जाना होगा,
कभी जरा सी फुरसत,
निकाल लिया करो,
निःस्वार्थ भी कुछ पल,
गुजार लिया करो,
किसी की हताश आंखों का दर्द,
साथ बैठकर सुनने के लिए,
किसी के होंठों में दबाई खुशी,
साझा कर चहकने के लिए,
किसी के जिद्दी संघर्ष की पीठ,
जरा सा थपथपाने के लिए,
यहां भी ज्यादा वक्त,
तुम्हें नहीं लगाना होगा,
बस थोड़ी देर के लिए,
खुद को भुलाना होगा,
कभी-कभार दूसरों के लिए भी,
हंस लिया करो, रो लिया करो,
ईश्वर तमाम मौके देता रहेगा,
जब चाहे ईश्वर हो लिया करो…
5. मैं introvert हूं
किसी को chill करना है,
किसी को fun चाहिए,
मैं introvert हूं,
मुझे मेरा अकेलापन चाहिए…
तुम्हें रूप रंग सब चाहिए,
तुम्हें इश्क में भी गबन चाहिए,
मैं introvert हूं,
मुझे सिर्फ तुम्हारा मन चाहिए…
औरों की तुम्हें कहां परवाह,
तुम्हें सिर्फ अपना टशन चाहिए,
मैं introvert हूं,
मुझे सिरफिरा जतन चाहिए…
आज बहस करके भूल जाते हो,
तुम्हें कल नई टेंशन चाहिए,
मैं introvert हूं,
मुझे रत्ती भर नहीं अनबन चाहिए,
बदल लेते हो विचारों के पाले,
तुम्हें सिर्फ अपना मिशन चाहिए,
मैं introvert हूं,
मुझे भीड़ में भी अपना कहन चाहिए,
तुम्हें आलीशान घर, गाड़ियां,
और पैसों की खनखन चाहिए,
मैं introvert हूं,
मुझे शांति भरा जीवन चाहिए…
